Parshuram Jayanti 2023: परशुरामजी की जयंती वैशाख मास में शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाई जाती है।
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परशुरामजी की जयंती वैशाख मास में शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाई जाती है। इस पावन दिन को अक्षय तृतीया कहा जाता है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया पर भगवान विष्णु के अवतार परशुराम का जन्म हुआ था। भगवान परशुराम भार्गव वंश में जन्मे भगवान विष्णु के छठे अवतार हैं, उनका जन्म त्रेतायुग में हुआ था। माना जाता है कि इस दिन किया गया दान-पुण्य कभी क्षय नहीं होता। अक्षय तृतीया के दिन जन्म लेने के कारण ही भगवान परशुराम की शक्ति भी अक्षय थी। इतना ही नहीं इनकी गिनती तो महर्षि वेदव्यास, अश्वत्थामा, राजा बलि, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, ऋषि मार्कंडेय सहित उन आठ अमर किरदारों में होती है जिन्हें कालांतर तक अमर माना जाता है। उनके पिता का नाम जमदग्नि और माता का नाम रेणुका था।
पौराणिक ग्रंथों में वर्णित है कि भगवान परशुराम अत्यंत क्रोधी स्वभाव के थे। इनके क्रोध से देवी-देवता भी थर-थर कांपते थे। धार्मिक मान्यता के अनुसार, एक बार परशुराम ने क्रोध में आकर भगवान गणेश का दांत तोड़ दिया था। वहीं पिता के कहने पर उन्होंने अपनी मां को भी मार दिया था। इस दिन भगवान विष्णु के परशुराम अवतार की पूजा करने से शौर्य, कांति एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है और शत्रुओं का नाश होता है।
इसलिए किया माता का वध
श्रीविष्णु अवतार भगवान परशुराम पराक्रम के प्रतीक माने जाते हैं। वह अपने माता-पिता के परम आज्ञाकारी पुत्र थे। पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार परशुराम की माता रेणुका जल लेने नदी पर गईं। वहां उन्होंने गंधर्वराज चित्ररथ को जल में अप्सराओं के साथ देखा और कुछ देर वहीं ठहर गईं। उस समय माता रेणुका के मन में विकार उत्पन्न हो गया था। अचानक उन्हें याद आया कि उनके पति के हवन का समय हो रहा है और वो तुरंत जल लेकर घर पहुंचीं। जमदग्नि ऋषि ने अपने तपोबल से अपनी पत्नी का मानसिक व्यभिचार जान लिया। उन्होंने परशुराम से बड़े अपने तीन पुत्रों को आज्ञा दी कि वो अपनी माता का वध कर दें लेकिन किसी ने भी इसे पाप समझकर अपने पिता की बात नहीं मानी।
अंत में ऋषि ने परशुराम को अपनी माता का वध करने की आज्ञा दी। साथ ही उन्होंने कहा कि अपने भाइयों का भी वध कर दो क्योंकि इन्होंने मेरी आज्ञा का पालन नहीं किया। परशुराम ने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए अपनी माता और भाईयों का वध कर दिया। पुत्र की पितृभक्ति देख जमदग्नि ऋषि प्रसन्न हुए और उन्होंने परशुराम से वर मांगने को कहा। परशुराम अपने पिता का तपोबल जानते थे, उन्होंने अपने पिता से अपनी मां और भाईयों को पुनर्जीवित करने का वरदान मांगा। उन्होंने पिता से मांगा की उनकी मां और भाई ऐसे जीवित हों जैसे कि निद्रा से जागे हों और उन्हें इस बात का स्मरण न रहे कि मैंने उन्हें मारा था। जमदग्नि ऋषि के तपोबल से ऐसा ही हुआ। पुत्र की तीव्र बुद्धि को देख ऋषि ने उन्हें ख्याति और अस्त्र-शस्त्र में निपुणता का भी वरदान दिया।