परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, त्रेतायुग में बलि नामक एक असुर राजा था। असुर होने के बावजूद भी वह महादानी और भगवान श्री विष्णु का बहुत बड़ा भक्त था।वैदिक विधियों के साथ वह भगवान का नित्य पूजन किया करता था। उसके द्वार से कभी कोई खाली हाथ नहीं लौटता था। कहा जाता है कि अपने वामनावतार में भगवान विष्णु ने राजा बलि की परीक्षा ली थी। राजा बलि ने तीनों लोकों पर अपना अधिकार कर लिया था लेकिन उसमें एक गुण यह था कि वह किसी भी ब्राह्मण को खाली हाथ नहीं भेजता था उसे दान अवश्य देता था।
दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने उसे भगवान विष्णु की लीला से अवगत भी करवाया, लेकिन फिर भी राजा बलि ने वामन स्वरूप भगवान विष्णु को तीन पग भूमि देने का वचन दे दिया। फिर क्या था दो पगों में ही भगवान विष्णु ने समस्त लोकों को नाप दिया तीसरे पग के लिये कुछ नहीं बचा तो बलि ने अपना वचन पूरा करते हुए अपना शीष उनके पग के नीचे कर दिया।
भगवान विष्णु की कृपा से बलि पाताल लोक में रहने लगा, लेकिन साथ ही उसने भगवान विष्णु को भी अपने यहां रहने के लिये वचनबद्ध कर लिया था। मान्यता है कि वामन अवतार की इस कथा को सुनने और पढ़ने वाला व्यक्ति तीनों लोकों में पूजित होता है।