मिथुन संक्रांति 2020: सूर्य जिस राशि में प्रवेश करता है उसी राशि के नाम पर हर महीने की संक्रांति आती है।
आज मिथुन संक्रांति है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार जब भी सूर्य एक राशि को छोड़कर दूसरी राशि मे जाता है तो इस परिवर्तन को संक्रांति कहते हैं। सूर्य हर एक महीने में अपनी राशि को बदलता है ऐसे में एक सौर मास में कुल 12 संक्रांतियां आती हैं। सूर्य जिस राशि में प्रवेश करता है उसी राशि के नाम पर हर महीने की संक्रांति आती है। हिंदू धर्म में संक्रांति के त्योहार पर दान और पूजा-पाठ का विशेष महत्व होता है। भगवान सूर्य 14 जून की रात्रि 11 बजकर 51 मिनट पर वृषभ राशि की यात्रा समाप्त करके मिथुन में प्रवेश कर गए हैं। इस राशि पर ये 16 जुलाई की सुबह 10 बजकर 45 मिनट तक विद्यमान रहेंगे, उसके बाद कर्क राशि में प्रवेश कर जाएंगे। जो कर्क संक्रांति कहलाएगी। इस बार मिथुन संक्रांति का वाहन हाथी है। इस कारण विद्वान और शिक्षित लोगों के लिए ये संक्रांति शुभ फल देने वाली रहेगी। इसके प्रभाव से धन और समृद्धि भी बढ़ेगी।
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सूर्य पूजा का महत्व
हिंदू पंचांग के अनुसार मिथुन संक्रांति सौर माह के तीसरे महीने आषाढ़ में आती है। इस महीने वर्षा होती है और इस माह के देवता भी सूर्य होते हैं ऐसे में इस मिथुन संक्रांति के त्योहार का महत्व होता है। जो भी व्यक्ति संक्रांति के दिन सुबह जल्द उठकर भगवान सूर्य को जल चढ़ाता है और पूजा पाठ करता है सूर्य देव उनको निरोगी रहने का आशीर्वाद देते हैं। जो भी व्यक्ति सूर्य के मिथुन संक्रांति पर लाल कपड़े, लाल चंदन, लाल फूल और तांबे के बर्तन का उपयोग कर सूर्य की पूजा करता है उसके घर में सुख और संपन्नता का वास होता है। पूजा के बाद इस दिन दान करने से हर मनोकामना पूरी होती है।
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वेदों और पुराणों में सूर्य का महत्व
वैदिक काल से भगवान सूर्य की उपासना का उल्लेख मिलता है। वेदों में सूर्य को जगत की आत्मा और ईश्वर का नेत्र बताया गया है। सूर्य को जीवन, स्वास्थ्य एवं शक्ति के देवता के रूप में मान्यता हैं। सूर्यदेव की कृपा से ही पृथ्वी पर जीवन बरकरार है। ऋषि-मुनियों ने उदय होते हुए सूर्य को ज्ञान रूपी ईश्वर बताते हुए सूर्य की साधना-आराधना को अत्यंत कल्याणकारी बताया है। प्रत्यक्ष देवता सूर्य की उपासना शीघ्र ही फल देने वाली मानी गई है। जिनकी साधना स्वयं प्रभु श्री राम ने भी की थी। विदित हो कि प्रभु श्रीराम के पूर्वज भी सूर्यवंशी थे। भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र सांब भी सूर्य की उपासना करके ही कुष्ठ रोग दूर कर पाए थे।
सूर्य की साधना का ज्योतिष में महत्व
शास्त्रों में कहा गया है कि सूर्यदेव की साधना से अक्षय फल मिलता है। भगवान भास्कर अपने भक्तों को सुख-समृद्धि एवं अच्छी सेहत का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। ज्योतिष के अनुसार सूर्य को नवग्रहों में प्रथम ग्रह और पिता के भाव कर्म का स्वामी माना गया है। जीवन से जुड़े तमाम दुखों और रोग आदि को दूर करने के साथ-साथ जिन्हें संतान नहीं होती उन्हें सूर्य साधना से लाभ होता हैं। पिता-पुत्र के संबंधों में विशेष लाभ के लिए सूर्य साधना पुत्र को करनी चाहिए।