आपने देखा होगा कि जब शादी की बात शुरु होती है तो सबसे पहले यह पूछा जाता है कि गोत्र क्या है। अगर आपने फिल्म 'तेरे नाम' देखी है तो याद कीजिए उस दृश्य को, जब रामेश्वर, राधे से पूछता है 'गोत्र क्या है'।
जवाब में राधे भइया मनमौजी अंदाज में कहते हैं 'गोत्र का मुरब्बा बनाओगे क्या'। लेकिन असल जिंदगी में गोत्र को नजर अंदाज करना नुकसादेय हो सकता है। गोत्र को शास्त्रों में बड़ा महत्व दिया गया है। शास्त्र कहते हैं कि विवाह करते समय इस बात का जरुर ध्यान रखें कि लड़का लड़की एक ही गोत्र के नहीं हों।
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शास्त्रों में कहा गया है कि सगोत्र में विवाह करना उसी प्रकार है जिस प्रकार भाई बहनों के बीच विवाह होना। इससे वैवाहिक जीवन में कई प्रकार की परेशानियां आती है। मनुस्मृति में कहा गया है कि विवाह के लिए उपयुक्त कन्या वही है 'जो माता की सात पीढ़ियों को छोड़कर पिता के गोत्र से भिन्न हो।
माना जाता है कि सगोत्र में विवाह करने से संतान की बौद्घिक क्षमता प्रभावित होती है। इनके बच्चे विकलांग भी हो सकते हैं।