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रामेश्वरम में लगा है कुंभ 30 सितंबर को है मुख्य स्नान

Fri, 30 Sep 2016 12:58 PM IST
श्याम किशोर सहाय
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रामेश्‍वरम
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यह सुनकर आपको थोड़ा अचरज हो सकता है। लेकिन है सच। देश के अलग-अलग पौराणिक स्थलियों पर कुंभ उत्सव के पुनर्जागरण अभियान के तहत रामेश्वरम में इस समय कुंभ उत्सव लगा हुआ है। इसका स्वरूप बाकी कुंभों जैसा नहीं है। लाखों की तुलना में यहां कुछ हजार लोग आपको मिलेंगे। लेकिन जितने भी लोग इसमें सहभागी है उन्हें एक परंपरा के पुनर्जागरण अभियान का हिस्सा बनने का गर्व है।
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प्रमाण मिलते हैं कि वैदिक युग में द्वादश यानी 12 स्थानों पर कुंभ की परंपरा थी। विदेशी आक्रमणों और दूसरे कई कारणों से यह परंपरा लुप्त हो गयी। बीते लगभग छह वर्षों से इन सुप्त कुंभ स्थलियों के पुनर्जागरण का अभियान चल रहा है। बिहार के मिथिलांचल इलाके के बेगूसराय जिले में गंगा के मनोरम तट पर स्थित सिमरिया से यह अभियान प्रारंभ हुआ। बद्रीनाथ, जगन्नाथपुरी और द्वारिका होता हुआ अब रामेश्वरम पहुंचा है।

अगले वर्ष 2017 में इसी कड़ी में सिमरिया में महाकुंभ का आयोजन होने वाला है। सिमरिया को पौराणिक समुद्र मंथन की केन्द्र स्थली के रूप में जानते हैं। आगम शास्त्र में शामिल 64 यामलों में एक रुद्रयमलतंत्र में द्वादश कुंभ स्थलियों का वर्णन स्पष्ट रूप से मिलता है। दूसरे कई पुराणों और शास्त्रों में भी इसका वर्णन है। विष्णु पुराण में स्पष्ट उल्लेख है- 
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‘देवानां द्वादशहोभिर्भर्त्येद्वादशवत्सरै: जायंते कुंभ पर्वाणि तथा द्वादश संख्यया ’

सबसे पहले इन सुप्त कुंभ स्थलियों के पुनर्जागरण का विचार सिमरिया में गंगा पुत्र और फलाहारी बाबा के नाम से प्रसिद्ध स्वामी चिदात्मन जी महाराज के मन में आया। उनके इस पावन विचार को बिहार के दरभंगा स्थित कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विवि के विद्वत परिषद ने प्रस्ताव पारित कर सहर्ष सहमति दी। अन्यान्य विश्व विद्यालयों के वेदाचार्य, ज्योतिषाचार्य और विद्वानों ने अपना समर्थन दिया। देश भर के इतिहासकारों, समाज शास्त्रियों और बुद्धिजिवियों ने इस पहल को ऐतिहासिक करार दिया। कई पंचांगों में विधिवत रूप से इसका उल्लेख आने के बाद द्वादश कुंभ अभियान ने अब समाज के मानस में अपना एक स्थायी स्थान बना लिया है।

दरअसल ज्योतिष में कुंभ एक योग है। सूर्य, चंद्रमा और वृहस्पति के विशेष राशियों में आने पर कुंभ योग बनता है। राशियां 12 हैं, महीने 12 हैं और आदित्य यानी सूर्य भी 12 हैं। इस तरह से वर्ष भर में अलग-अलग महीने में सूर्य देव अलग-अलग राशियों में पूरे एक महीने के लिए रहते है। वृहस्पति 12 वर्ष में सूर्य का एक चक्कर लगाते हैं। इस तरह से 12 अलग-अलग वर्ष अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग महीनों में कुंभ का योग बनता है। इस दृष्टि से महीने, राशियां और आदित्य 12 हैं तो कुंभ भी 12 होने चाहिए।

वैदिक युग में ऐसा था भी। पराधीनता के काल में कई परंपराएं लुप्त हुईं तो कुंभों का भी लोग हो गया। एक समय तो सभी कुंभ लगभग लुप्तप्राय थे। कहते हैं प्रयाग के लुप्त हो चुके महाकुंभ को प्रतापी राजा हर्षवर्धन (1605-1647 ई।) ने अपने समय में दानोत्सव नाम से शुरू कराया। बाद में जगदगुरू शंकराचार्य के प्रभाव में हिन्दूओं के संगठन और दशनामी परंपरा के गठन के बाद इन कुंभ का पुराना स्वरूप लौट पाया। फिर भी 12 में से केवल 4 कुंभों को ही स्थापित किया जा सका। शेष आठ कुंभों के विषय में कह दिया जाता था कि वो स्वर्ग में लगते है। लेकिन किसी ये यह बताने का कष्ट नहीं किया कि स्वर्ग है कहां।

जिस समुद्र मंथन की चर्चा हर पौराणिक ग्रंथ में मिलती है उस स्थान की भी स्पष्ट पहचान अभी तक कहीं नहीं थी। शोध में यह बात साफ हो गयी है कि बिहार में स्थित मिथिलांचल की धऱती ही समुद्र मंथन की केन्द्रीय स्थली थी। सिमरिया से कुछ किलोमीटर की दूरी पर ही मंदार पर्वत और वासुकीनाथ धाम स्थित है। कहते हैं मंदार को मथनी और वासुकी नाग को रस्सी बना कर ही समुद्र मंथन किया गया था। मिथिलांचल के इलाके में ऐसे और भी प्रमाण मिलते हैं जिससे यह साबित होता है कि इसी भूभाग पर समुद्र मंथन हुआ था।

प्रश्न उठता है कि क्या वहां समुद्र था? दरअसल यह घटना बहुत पहले की है। कहा जाता है कि हिमालय का उद्भव समुद्र से हुआ है। हिमलाय के शिखर पर ऐसे जीवाश्म मिले हैं जो समुद्र के अंदर पाए जाने वाले जीवों के है। इसी आधार पर कहा जा सकता है कि किसी समय इस हिस्से में समुद्र अवश्य रहा होगा। वैसे भी मिथिलांचल और सिमरिया से बंगाल की खाड़ी की दूरी बहुत अधिक नहीं है।
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उसी पावन सिमरियाधाम में वर्ष 2017 में तुला की संक्रांति में महाकुंभ का आयोजन होने वाला है। इस महाकुंभ की तैयारी अभी से शुरू हो चुकी है।
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