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Kumbh 2019: कौन थे आदि शंकाराचार्य, क्यों बनाया एक चांडाल को अपना गुरु

Sun, 03 Feb 2019 04:57 PM IST
विनोद शुक्ला स्वामी विष्णुदेवानंद तीर्थ
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kumbh 2019
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शंकराचार्य के अनुसार, तमाम दुनियावी चीजें या तो भ्रम हैं या हमारे बौद्धिक ज्ञान पर आधारित सच। ब्रह्म अर्थात ईश्वर, आत्मा, चेतना आदि शाश्वत सत्य हैं। असल में सत्ता इसी सच की है, बाकी माया अर्थात भ्रम है। यही वह सत्य है, जिसने शंकराचार्य को प्रोत्साहित किया कि यहां भारत भूमि और संस्कृति को एक सूत्र में जोड़ा। वह सिर्फ दार्शनिक-धार्मिक व्यक्ति ही नहीं, राजनीतिक संत भी थे।

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शंकराचार्य की ख्याति भारत के प्रमुख तीर्थ स्थानों की यात्रा, अपने समय के आचार्यों और विद्वानों से भेंट के अलावा श्रीमद्भगवद गीता, ब्रह्मसूत्र और बारह उपनिषद ग्रंथों पर टीका ग्रंथों के लिए भी है। उनकी तीन रचनाएं प्रमुख हैं- ‘दक्षिणामूर्ति स्तोत्र’, ‘गोविंदाष्टक’ और ‘सौंदर्य लहरी’। इनमें शिव, विष्णु और शक्ति की आराधना की गई है और उनकी लीलाओं को गाया गया है। तंत्र पर लिखकर उन्होंने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। शून्यवाद और निराकार ब्रह्म की चर्चा करते हुए शंकराचार्य ने बारह ज्योतिर्लिंग, अठारह शक्तिपीठ और चारों धामों की यात्रा की तथा भारत की आत्मा को तलाशा। 

शंकराचार्य ने भारत भूमि तथा संस्कृति को एक सूत्र में जोड़ा। उस दौर में गुप्त साम्राज्य का पतन हो रहा था और मुस्लिम साम्राज्य की दक्षिण एशिया में जीत हो रही थी। कन्नौज के शासक हर्षवर्धन की मृत्यु हो चुकी थी। नर्मदा के दोनों किनारों पर राष्ट्रकूट साम्राज्य का बोलबाला था, जिसका उत्तर में प्रतिहारों, पूर्व में पाल और दक्षिण में चालुक्यों से लगातार संघर्ष चल रहा था। उस समय तक क्षेत्रीय भाषाएं और लिपियां जो आज के दौर में चल रही हैं, उभरी नहीं थीं। दक्षिण भारतीय मंदिरों में ‘गोपुरम’ (मुख्य प्रवेश द्वार) का जो गुणशिल्प आज मिलता है, उस दौर में नहीं था। जयदेव ने ‘गीत गोविंद’ की रचना नहीं की थी, जिसने पहली बार दुनिया को कृष्ण की राधा से परिचित कराया। 
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एक चांडाल को अपना गुरु बनाया
उस दौर में शंकराचार्य ने पूरे भारत वर्ष का भ्रमण करते हुए हर जगह सिर्फ एक ही भाषा ‘संस्कृत’ में संवाद किया, जो उच्च बौद्धिक वर्ग को जोड़ती थी। शंकराचार्य का जन्म केरल के एक गरीब ब्राह्मण (नंबूदरी) परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम शिवगुरु था। शंकराचार्य छोटे ही थे, जब उनके पिता का निधन हो गया। उनका पालन-पोषण उनकी मां ने ही किया। वह कृष्ण भक्त थीं। मां के विरोध के बावजूद शंकराचार्य ने संन्यास का रास्ता चुना, क्योंकि वह वेदांतिक दृष्टिकोण के समर्थक थे। उनके गुरु गोविंद भगवत्पाद, वैष्णव थे और नर्मदा के किनारे कुटिया बनाकर रहते थे।

गुरु के पास काफी समय रहने के बाद वह काशी चले गए। वहां उन्होंने एक चांडाल को अपना गुरु बनाया। उस समय समाज में चांडाल को अछूत माना जाता था। कहा जाता है जब आदि शंकराचार्य काशी में श्मशान घाट जा रहे थे तब उनका सामना चांडाल से हो गया। आदि शंकराचार्य ने उन्हें हटने को कहा। जवाब में चांडाल ने हाथ जोड़ कर बोला महाराज क्या हटाऊं, शरीर या आत्मा। चांडाल के दार्शनिक विचार से प्रभावित होकर उन्होंने चांडाल को अपना गुरू बना लिया था।

संन्यासी होने के बाद भी अपनी मां का किया था अंतिम संकार
शंकराचार्य के जीवन से जुड़ी एक और खास बात यह है कि वह अपनी मां का अंतिम संस्कार करने के लिए केरल लौटे थे। उन्होंने अपनी मां से उन्हें संन्यासी बनने की अनुमति देते समय ऐसा करने का वादा किया था। परंपरा के मुताबिक, गृहस्थी छोड़ने के बाद संन्यासियों को कोई भी संस्कार करने की इजाजत नहीं होती। लेकिन शंकराचार्य साधारण संन्यासी नहीं थे, बल्कि स्थापित मान्यताओं को नकारने वाले क्रांतिकारी थे। जब उन्हें श्मशान में अपनी मां का अंतिम संस्कार करने की इजाजत न मिली, तो उन्होंने अपने घर के पिछले हिस्से में उनका अंतिम संस्कार कर अपना वादा निभाया। 

चारों दिशाओं में मठ स्थापित किए
कई लोग मानते हैं कि शंकराचार्य का दर्शन सिर्फ अभिजात्य बौद्धिक वर्ग के लिए है, बल्कि आम लोगों के लिए भी है। अपने दर्शन को आमजन तक पहुंचाने के लिए उन्होंने पूरे देश में चारों दिशाओं में मठ स्थापित किए। संन्यासियों के लिए अखाड़े स्थापित किए, जिनमें शामिल होने वाले साधुओं को उनकी बौद्धिक, शारीरिक और यौगिक शक्ति से धर्म की रक्षा का भार सौंपा गया। माना जाता है कि उन्होंने ही तीर्थ क्षेत्रों और कुंभ मेलों में इन अखाड़ों के जुटने का चलन शुरू किया था। इन कामों को करने के बाद बत्तीस साल की उम्र में हिमालय क्षेत्र में शंकराचार्य का देहांत हो गया।

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