विश्वामित्र प्राचीन भारत के अति प्रसिद्ध ऋषियों में हैं। रघुकुल में वसिष्ठ और विश्वामित्र की बहुत पहुँच थी। भगवान राम पर आधिपत्य को लेकर यह दोनों ही ऋषि एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा में थे। जहाँ विश्वामित्र राक्षसों के संहार के लिए भगवान राम को ले गये थे और वे ही उन्हें राजा जनक के यहाँ होने वाले स्वयंवर में लेकर गये थे, तो दूसरी तरफ ऋषि वसिष्ठ रघुकुल के आचार्य थे।
विश्वामित्र जन्म से ब्राह्मण नहीं थे। इनका पूर्व नाम राजा कौशिक था। एक बार वे अपनी विशाल सेना के साथ जंगल में निकल गये थे और रास्ते में पडऩे वाले महर्षि वसिष्ठ के आश्रम मेें उनसे मिले। महर्षि वसिष्ठ ने उनका और उनकी सेना का सत्कार किया और सबको भोजन कराया। राजा कौशिक को इस पर आश्चर्य हुआ तो वसिष्ठ ने बताया कि मेरे पास नंदिनी गाय है जो कामधेनु की पुत्री है और स्वयं इंद्र ने महर्षि को भेंट की थी।
राजा कौशिक ने नंदिनी को पाने के लिए जिद की, परन्तु वसिष्ठ ने मना कर दिया। इस पर कौशिक ने बलपूर्वक नंदिनी को ले जाने की कोशिश की। कथा है कि नंदिनी ने वसिष्ठ की आज्ञा से अपने योग बल से सारी सेना को ध्वस्त कर दिया और राजा कौशिक को बंदी बनाकर वसिष्ठ के सामने प्रस्तुत किया। कौशिक ने वहाँ पर भी वसिष्ठ पर आक्रमण किया। महर्षि वसिष्ठ ने क्रोध में आकर राजा कौशिक के एक पुत्र को छोड़कर बाकी सभी को शाप देकर भस्म कर दिया।
इस घटना के बाद राजा कौशिक ने राजपाठ को अपने पुत्र को सौंप दिया और हिमालय में जाकर भगवान शिव की घनघोर तपस्या की और वरदान स्वरूप कई दिव्यास्त्र प्राप्त किये। इसके पश्चात् वे पुन: महर्षि वसिष्ठ से युद्ध को प्रस्तुत हुए। वसिष्ठ ने उनका हर अस्त्र नष्ट कर दिया और ब्रह्मास्त्र का संधान किया। सभी देवताओं ने आकर वसिष्ठ से प्रार्थना की और उन्हें शांत किया तथा वसिष्ठ ने ब्रह्मास्त्र को वापस ले लिया।
राजा कौशिक को अत्यंत पश्चाताप हुआ कि कालास्त्र, मानव, मोहन, गांधर्व, जृंभण, व्रज, ब्रह्मपाश, कालपाश, वरुण पाश, पिनाक, दण्ड, पैशाच, क्राँच, धर्मचक्र, कालचक्र,
विष्णुचक्र, वायव्य, मंथन, मूसल, विद्याधर, कंकाल के होते हुए भी वह पराजित हो गये। उन्हें ज्ञान हुआ कि क्षात्र बल से ब्रह्म बल श्रेष्ठ है। उन्होंने पुन: तपस्या की और ब्रह्मा ने उन्हें राजर्षी पद प्रदान किया। परन्तु वे संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने पुन: तपस्या प्रारम्भ की और बहुत सारे विघ्रों के बाद भी तपस्या को पूर्ण किया और इन्द्र ने उन्हें ब्राह्मण पद प्रदान किया।
अब वे विश्वामित्र थे तथा इन्द्र से उन्होंने वषट्कार तथा चारों वेद भी माँगे। परन्तु उनकी प्रतिज्ञा थी जब तक ऋषि वसिष्ठ उन्हें ब्रह्मऋषि पद नहीं देंगे तब तक वे शांत नहीं होंगे। बाद में उन्हें वसिष्ठ ने भी ब्रह्मऋषि के रूप में स्वीकार कर लिया। क्रोध में दोनों ने एक-दूसरे के पुत्रों को नष्ट कर दिया था, परन्तु अब विश्वामित्र भी क्रोध और मोह के बंधनों से ऊपर उठ चुके थे।