गंगा दशहरा 2021 (प्रतीकात्मक तस्वीर)
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पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक राजा हुए जिनका नाम सगर था। ये एक एक प्रतापी और शक्तिशाली राजा थे। इनकी दो पत्नियां थी। एक का नाम केशनि और दूसरी का नाम सुमती था। एक बार ऋषि औरवा द्वारा दो वरदान दिए गए थे पहला वरदान एक बुद्धिमान और पवित्र पुत्र जो एक दिन एक महान राजा बन जाएगा और दूसरा वरदान साठ हजार पुत्र। जहां केशनि ने एक बुद्धिमान पुत्र मांगा तो वहीं सुमति ने साठ हजार पुत्रों को चुना। सम्राट सगर के साठ हजार बेटों ने सभी के लिए कई समस्याएं पैदा कर दी। इंद्र और अन्य देवता एवं साधु-संत उनकी द्वारा उत्पन्न परेशानियों से तंग आ चुके थे। इंद्र इसका समाधान खोजने के लिए ऋषि कपिल से संपर्क किया। ऋषि कपिल ने उन पुत्रों का ध्यान राज-काज में लगाने के लिए राजा से अश्विमेध यज्ञ करने के लिए कहा। राजा सगर के अश्वमेध घोड़े को देवराज इंद्र ने पकड़ लिया और घोड़े को कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया। उधर राजा सगर के 60 हजार पुत्र अश्वमेध घोड़े की तलाश में निकल पड़े। जब उन्होंने मुनि के आश्रम में घोड़े को बंधा देखा तो उन्हें लगा कि ऋषि ने अश्व को चोरी कर लिया है। उन्होंने आश्रम पर ही धावा बोल दिया। इसी समय तप में लीन कपिल मुनि का ध्यान टूटा तो वो क्रोधित हो उठे। मुनि की आंखों में ज्वाला उठी और सगर के 60 हजार पुत्रों को पलभर में राख कर दिया। राजा सगर के दूसरे पुत्र अंशुमान को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने कपिल मुनि से अपने भाइयों की आत्मा के उद्धार की प्रार्थना की। तब कपिल मुनि ने उन्हें बताया कि यदि पवित्र गंगा का जल भस्म हुए सगर पुत्रों पर छिड़का जाए तो उन्हें मुक्ति मिल सकती है। अंशुमान ने बहुत कोशिश की लेकिन वो अपने भाइयों को कपिल मुनि के कोप से मुक्त नहीं करा सके। बाद में उनकी पीढ़ी में उनके पोते राजा भगीरथ का जन्म हुआ।
गंगा दशहरा 2021 (प्रतीकात्मक तस्वीर)
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इस तरह पृथ्वी पर अवतरित हुई गंगा और कहलाई भागीरथी
भागीरथ ने अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए तपस्या करने का बीड़ा उठाया। पूर्वजों का उद्धार करने के लिए भगीरथ ने कठोर तपस्या की और आखिरकार गंगा को धरती पर आने की उनकी प्रार्थना को स्वीकार करना पड़ा और वे पृथ्वी पर अवतरित होने के लिए तैयार हो गई। भागीरथ के पृथ्वी पर लाने के कारण गंगा भागीरथी कहलाई।
इस तरह गंगा कहलाई जटाशंकरी
भागीरथ ने धीरे स्वर में गंगा की आवाज सुनी। 'महाराज मैं आपकी इच्छानुसार धरती पर आने के लिये तैयार हूं लेकिन मेरी तेज धारा को धरती पर रोकेगा कौन। अगर वह रोकी न गई तो धरती के स्तरों को तोड़ती हुई पाताल लोक में चली जायेगी। जब भागीरथ ने इसका उपाय पूछा तो गंगा ने कहा, महाराज मेरी प्रचंड धारा को केवल शिव रोक सकते है। यदि वे अपनी जटाओं में मेरी धारा को रोकने के लिये मान जाये तो मैं पृथ्वी पर आ सकती हूं। इसके बाद भागीरथ भगवान शिव की अराधना में लग गये। तपस्या से प्रसन्न होकर शिव जी ने गंगा की धारा को सिर पर रोकने के लिये तैयार हो गये। तब शिव जी ने गंगा को अपनी जटाओं में बांध लिया। इसके बाद शिव जी ने अपनी एक जटा को खोलकर गंगा की धारा को मुक्त कर दिया। शिव जी की जटाओं से निकलने के कारण ये जटाशंकरी कहलाई।
जब धरती पर आई गंगा और कहलाई जाह्नवी
जब शिव जी की जटाओं से निकलकर गंगा की अविरल धारा कल-कल करती हुई पृथ्वी पर आई तो मार्ग में जहृु ऋषि की कुटिया पड़ी वह कुटिया गंगा की तेज धारा में बह गई। इससे ऋषि क्रोधित हो गए और उन्होंने योग शक्ति से धारा को रोक दिया। जब भागीरथ ने प्रार्थना की तो ऋषि ने गंगा को मुक्त कर दिया। इसके बाद जहु ऋषि की कुटिया से निकलने के कारण गंगा का नाम जाह्नवी हो गया।
ऐसे किया मां गंगा ने भागीरथ के पूर्वजों का उद्घार
वहां से निकलने के बाद कपिल मुनि के आश्रम में पहुंचकर गंगा ने भागीरथ के महाराज सगर आदि पूर्वजों का उद्वार कर दिया और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई, इसलिए मां गंगा को मोक्षदायिनी भी कहा जाता है।