उदाहरण के तौर पर देखिए, कई असुरों ने देवताओं से शत्रुता मोल ली। वे स्वयं को देवलोक का अधिपति समझने लगे। लेकिन उनका अंत कैसे हुआ ये सभी जानते हैं। रावण देवताओं को अपना शत्रु मानता था। वह इतना अहंकारी हो गया था कि उसने देवताओं को अपनी शक्ति के बल पर खूब परेशान किया और अंत में भगवान श्रीराम के हाथों उसका वध हो गया।
गाय के अपमान के कारण ही बलासुर का वध हुआ था। पौराणिक कथा के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि उसने देवताओं की गायों का अपहरण कर लिया था। तब क्रोध में आकर देवराज इंद्र ने उसका वध कर दिया था।
मैत्रेय ऋषि के अपमान के कारण कौरव पुत्र दुर्योधन का विनाश हुआ था। कहते हैं महर्षि मैत्रेय ने दुर्योधन को अधर्म और ईर्ष्या की भावना को त्यागकर धर्म का साथ देने को कहा था, लेकिन दुर्योधन ने उन्हें अनसुना कर दिया और फिर महाभारत के युद्ध में क्या हुआ ये सभी जानते हैं।
महाभारत का एक और पात्र है- अश्वत्थामा, जो गुरु द्रोण का पुत्र था, लेकिन उसका मन हमेशा ही अधर्म के कामों में लगा रहता था। वह हमेशा से ही पांडवों को अपना शत्रु और दुर्योधन को अपना मित्र मानता था। धर्म की निंदा करने और अधर्म का साथ देने की वजह से ही भगवान कृष्ण ने उसे दर-दर भटकने और उसकी मुक्ति न होने का श्राप दिया था। कहते हैं अश्वत्थामा आज भी जिंदा है।
पौराणिक काल में वातापी और आतापी राक्षसों की कहानी भी आती है। वातापी और उसका भाई ब्राह्मणों को भोजन पर बुलाकर उनका वधकर देते थे। किंतु अगस्त्य ऋषि को जब ये पता चला तो वे भी वातापी के घर भोजन के लिए गए। उन्होंने उसे खाकर पचा लिया और उसके भाई का वध कर दिया। ये सभी उदाहरण भगवान श्रीकृष्ण की कही गई बातों के प्रमाण हैं।