Chaturmas 2025: आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। इस दिन से भगवान विष्णु चार महीनों के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। यह काल चातुर्मास कहलाता है, जो कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी) तक रहता है। शास्त्रों की मान्यता है कि योगनिद्रा एक दिव्य ,ऊर्जात्मक विश्राम है, जिसमें भगवान नारायण सृष्टि संचालन से कुछ समय के लिए विराम लेते हैं और इस दौरान भगवान शिव सृष्टि के संचालन को संभालते हैं। अतः इस दौरान विवाह, गृहप्रवेश जैसे मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं। यह समय तप, संयम, उपवास और भगवान की भक्ति के लिए श्रेष्ठ माना गया है। लेकिन भगवान विष्णु इस विशेष काल में योगनिद्रा में क्यों जाते हैं? इसके पीछे एक प्राचीन और प्रेरणादायक कथा है जो असुरराज बलि से जुड़ी है।
पराक्रमी और दानवीर राजा बलि
राजा बलि, प्रह्लाद के वंशज और राक्षस कुल में जन्मे एक महान राजा थे। उन्होंने कठोर तप और महादान के बल पर तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। उनकी शक्ति और धार्मिकता से देवता भी भयभीत हो उठे। इंद्रलोक छिन गया और देवता असहाय हो गए। तब सभी देवता भगवान विष्णु के पास सहायता हेतु पहुंचे।
भगवान विष्णु का वामन अवतार
देवताओं की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण किया। एक तेजस्वी ब्राह्मण बालक के रूप में। वे राजा बलि के यज्ञ में पहुंचे और विनम्रता से तीन पग भूमि दान में मांगी। राजा बलि ने बिना संकोच के दान देने का वचन दिया। तभी वामन ने विराट रूप धारण कर लिया और पहले पग में पृथ्वी, दूसरे पग में आकाश को नाप लिया।
राजा बलि की भक्ति ने भगवान को बांध लिया
अब तीसरे पग के लिए कोई स्थान न बचा। राजा बलि ने अपनी भक्ति का परिचय देते हुए अपना सिर अर्पित कर दिया और कहा, “भगवन, तीसरा पग मेरे सिर पर रख दीजिए।” इस त्याग और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि वे पाताल लोक के राजा बनेंगे और भगवान स्वयं उनके द्वारपाल के रूप में पाताल में निवास करेंगे।
योगनिद्रा की शुरुआत- बलि के वचन का पालन
इसी दिन से भगवान विष्णु हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल एकादशी को पाताल लोक में राजा बलि के पास योगनिद्रा में लीन हो जाते हैं। यह योगनिद्रा केवल विश्राम नहीं, बल्कि भक्ति से बंधे ईश्वर की लीला और वचनपालन का प्रतीक है।
देवउठनी एकादशी: पुनः जागरण और शुभ कार्यों की शुरुआत
चार महीने बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु जागते हैं। इस दिन को प्रबोधिनी एकादशी या देवउठनी एकादशी कहते हैं। इसी दिन से विवाह आदि शुभ कार्य पुनः आरंभ किए जाते हैं। राजा बलि और भगवान विष्णु की यह कथा भक्त और भगवान के बीच अनूठे प्रेम, त्याग और विश्वास का अनुपम उदाहरण है।