मां श्रीमहासरस्वती का प्राकट्य और उनकी आराधना का पावन पर्व माघ शुक्लपक्ष पंचमी (वसन्त पंचमी) 14 फरवरी, बुधवार को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। माघ माह में सूर्य के कुम्भ राशि में प्रवेश के साथ ॠतुओं के राजा वसन्त का पर्व रतिकाम महोत्सव शुभारम्भ होता है। बसंतऋतु की सम्पूर्ण अवधि अति शुभफलदाई है किन्तु पंचमी तिथि ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती का प्राकट्यपर्व है इसलिए यह दिन और भी शुभफल दायक हो जाता है। इस ऋतु को मधुमास भी कहा जाता है क्योंकि इस दिन के बाद न तो अधिक सर्दी पड़ती है और न ही अधिक गर्मी।
इस मौसम में संसार के लगभग सभी वृक्ष पुरानी पत्तियों को त्यागकर नई पत्तियों और पुष्प को जन्म देते हैं। फलों में श्रेष्ठ आम में पुष्प (बौर) भी इसी अवधि से दिखाई के देते हैं। चारों ओर हरियाली और पुष्प ही पुष्प ही नज़र आते है। मधुमक्खियों और भौरों का झुण्ड पुष्प लताओं पर मंडराता नजर आता है। वातावरण में भीनी-भीनी सुगंध की मस्ती छा जाती है। मौसम में भारी परिवर्तन दिखाई देता है। सृष्टि में जड़ता तोड़कर चेतनता प्रदान करने वाली मां सरस्वती का इस दिन जो कोई भी पूजन करता है, वह विद्या और ज्ञान दोनों प्राप्त करता है। चारों ओर उसका आदर-सत्कार होता है।
ऐसी मान्यता है कि इस दिन दस प्रमुख श्लोकों से मां सरस्वती की आराधना करने से सभी कार्यों में सिद्धि प्राप्त होती है। शिक्षण संस्थानों एवं विद्यार्थियों के लिए यह दिन वरदान की तरह है। कोई भी विद्यार्थी श्रद्धा और विश्वास से मां सरस्वती की आराधना करता है तो वह परीक्षा अथवा प्रतियोगिताओं में कभी फेल नहीं होता। जिसे सभी श्लोक न आते हों तो इस दसवें श्लोक से भी मां को प्रसन्न कर सकता है, जो श्लोक इस प्रकार है- 'एमम्बितमें नदीतमे देवीतमे सरस्वति। अप्रशस्ता इव स्मसि प्रशस्तिमम्ब नस्कृधि।| अर्थात- मातृगणो में श्रेष्ठ, देवियों में श्रेष्ठ हे माँ सरस्वती ! हमें प्रशस्ति यानी ज्ञान, धन व संपति प्रदान करें। यहां नदीरूपा सरस्वती का आध्यात्मिक भाव सुषुम्ना नाडी से है, जो इड़ा व पिंगला दोनों के मध्य भाग में स्थित है यह मूलाधार में दोनों के साथ युक्त है। यही आध्यात्मिक त्रिवेणी है। अतः बसंत पंचमी के दिन हे ! माता तुम सभी देवियों में सर्वश्रेष्ठ हो, उज्जवल हो, ज्योतिर्मय हो, ब्रह्मरूपा हो, जो कोई भी तुम्हे ब्रह्मरूप में ध्यान करता है वही तुम्हें जान सकता है, इस प्रकार के भाव के साथ मां सरस्वती की आराधना करनी चाहिए।
तीनों लोकों चौदह भुवनों सहित इस चराचर जगत में छाए अंधकार को दूर करने की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती को जो भक्तिपूर्वक पूजा करता है, उसे ज्ञानरूपी धन की प्राप्ति तो होती ही है उसका अज्ञानता का अन्धकार भी नष्ट हो जाता है। आदि शक्ति मां पार्वती से प्रादुर्भूत मां सरस्वती की अनुकम्पा से जड़ता में भी चेतनता का संचार होने लगता है अतः यह दिन उन्ही प्रसन्नता का है।
ज्ञान के पुजारियों को इस स्वयंसिद्ध मुहूर्त में मां की पूजा करके अपनी सम्पूर्ण मनोकामना पूर्ण कर लेनी चाहिए। इस दिन किया जाने वाला जप-तप दान-पुण्य आदि का फल अक्षुण होता है। ब्रह्मज्ञान की लालसा रखने वाले साधकों, शिक्षण संस्थानों, प्रतियोगिता में बैठने वाले प्रतियोगियों और विद्यार्थियों की इस दिन विधिपूर्वक मां की आराधना करनी चाहिए जिससे भविष्य में उनकी सफलताओं में किसी प्रकार की बाधा न उत्पन्न हो।
Basant Panchami 2024: वसंत पंचमी के दिन घर ले आएं ये चीजें, जाग उठेगी सोई तकदीर