चौड़े रास्ते ने पास चलती पगडंडी से कहा, अरी पगडंडी, मेरे रहते तुम्हारा अस्तित्व मुझे अनावश्यक-सा जान पड़ता है। व्यर्थ ही तुम मेरे आगे-पीछे, जाल-सा बिछाए चलती हो! रास्ता ऐसा तंज अक्सर आसपास की संरचनाओं पर कसता रहता था। उसे खुद पर बड़ा गुरूर था। पगडंडी को यह भली-भांति पता था।
उसने भोलेपन से कहा, आप ठीक कहते हैं भैया। मगर मैं नहीं जानती कि तुम्हारे रहते लोग मुझ पर क्यों चलते हैं? पहले एक चला, फिर दूसरा और उसके बाद तीसरा... इस तरह मेरा जन्म ही अनायास हुआ है! मुझे अपने होने का कोई मतलब समझ में नहीं आता। पगडंडी यह कहकर चुप हो गई, जैसे उसने रास्ते की बात के आगे समर्पण कर दिया हो।
फिर भी रास्ते ने दर्प के साथ कहा, मुझे तो लोगों ने बड़े यत्न से बनाया है। मैं अनेक शहरों-गांवों को जोड़ता चला जाता हूं। आसपास के लोग भी गाहे-बगाहे मुझसे ही सरोकार रखते हैं। पता नहीं, तुम्हारी क्या उपयोगिता है? पगडंडी आश्चर्य से चौड़े रास्ते की बातें सुन रही थी। फिर उसने नम्रता से कहा, तुम सच कहते हो। मैं तो बहुत छोटी हूं!
तभी एक भरी हुई यात्री गाड़ी रास्ते पर आई और रुक गई। सामने पड़ी छोटी पुलिया के एक तरफ बोर्ड लगा था कि भारी वाहन सावधान! पुलिया कमजोर है। यात्री-गाड़ी भरी हुई थी, इसलिए वह पुलिया पर से नहीं जा सकती थी। पूरी गाड़ी खाली करवाई गई। लोग पगडंडी पर चल पड़े। पगडंडी, पुलिया वाले सूखे नाले से जाकर, फिर उसी रास्ते से मिलती थी। पुलिया के उस पार खाली गाड़ी पहुंची, फिर यात्रियों को बैठाकर चल दी। यह दृश्य देख रहे रास्ते ने गहरा नि:श्वास छोड़ा, री, पगडंडी! आज मैं समझा, छोटी वस्तु भी वक्त आने पर मूल्यवान बन जाती है।