रामनरेश त्रिपाठी यशस्वी साहित्यकार थे। जौनपुर में पढ़ते समय उनकी भेंट एक महात्मा से हुई। किशोर रामनरेश ने महात्मा से पूछा, धर्म का सार क्या है? महात्मा ने कहा, सदाचार ही धर्म का सार है। सत्य और ईमानदारी का जीवन जीने वाला ही सच्चा भगवद्भक्त है। यह सुनकर उन्होंने संकल्प ले लिया कि वह हमेशा सदाचार का पालन करेंगे।
त्रिपाठी जी को अर्थोपार्जन के लिए कोलकाता जाना पड़ा। एक मारवाड़ी सेठ की दुकान पर उन्हें काम मिला। एक दिन दुकानदार अपनी दुकान की गद्दी पर 600 रुपये भूलकर घर चला गया।
सुबह उसे जब यह बात याद आई, तो वह भागा-भागा दुकान पर पहुंचा, पर वहां पैसे नहीं थे। नियत समय पर त्रिपाठी जी दुकान पर पहुंचे। उन्होंने जेब से रुपये निकाले और सेठ को देते हुए कहा, आप ये रुपये भूल गए थे। इन्हें गिन लें।
सेठ उनकी ईमानदारी देखकर हतप्रभ था। इनाम के रूप में उसने उन्हें कुछ रुपये देने चाहे, तो त्रिपाठी जी ने कहा, ईमानदारी और परिश्रम से धनोपार्जन करना मानव धर्म है। मैंने धर्म का पालन किया है, तो इनाम क्यों लूं?
कुछ समय बाद त्रिपाठी जी को साहित्यप्रेमी सेठ रामदयाल नेवटिया ने शेखावटी (राजस्थान) बुलवा लिया। उन्हें विद्यालय में शिक्षण कार्य सौंपा गया। सेठ ने उनसे अनुरोध किया कि वह स्कूली बच्चों के गायन के लिए एक प्रार्थना लिखें। वहीं उन्होंने हे प्रभु आनंददाता ज्ञान हमको दीजिए... जैसा लोकप्रिय गीत लिखा था।