बिहार में एक धनाढ्य रहता था। वह अपनी पुत्री मांगदिया का किसी श्रेष्ठ युवक से विवाह करना चाहता था। एक दिन उसने गौतम बुद्ध को देखा, तो प्रभावित होकर अपनी पुत्री से शादी का प्रस्ताव उनके सामने रखा।
गौतम ने विनम्रता से उत्तर दिया, मैं संसार त्याग चुका हूं। विवाह कैसे कर सकता हूं? युवती को इससे आघात लगा। कुछ दिनों बाद कौशांबी के राजा उदयन से मांगदिया का विवाह हो गया, पर उसके मन में बुद्ध के प्रति द्वेष बना रहा।
एक दिन रानी मांगदिया को पता लगा कि गौतम बुद्ध कौशांबी आने वाले हैं। उसने चुपके से पूरे शहर में प्रचार करा दिया कि गौतम बुद्ध कपटी हैं। नतीजतन नगर में पहुंचने पर बुद्ध को अपमान झेलना पड़ा।
शिष्य आनंद ने कहा, भंते, आप जैसे श्रमण का अपमान सहा नहीं जा रहा। बुद्ध ने जवाब दिया, आनंद, झूठ के पांव नहीं होते। सत्य सामने आता ही है। धैर्य रखो।
राजा उदयन बुद्ध की महानता जानते थे। उन्हें ठेस पहुंची कि उनके राज्य में एक संत का अपमान हुआ है। वह रानी मांगदिया के साथ बुद्ध के दर्शन को गए और प्रजा की अज्ञानता के लिए उनसे माफी मांगी।
बुद्ध ने कहा, मेरा किसी ने अपमान नहीं किया, क्योंकि साधु को सम्मान की आकांक्षा ही नहीं करनी चाहिए। बुद्ध के ये शब्द सुनकर रानी की आंखों से पश्चाताप के आंसू निकल पड़े।