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इस तरह पहली बार कलियुग ने दुनिया में कदम रखा

Fri, 13 Jun 2014 10:59 AM IST
वेद व्यास
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एक बार देवलोक में मंथन हुआ कि सृष्टि का निर्माण तो पूरा हुआ, लेकिन निर्मित जीवों का विनाश कैसे हो? करोड़ों किस्म के जीव-जंतु, वृक्ष-वनस्पति, मैदान, पर्वत, नदी-तालाब, ग्रह-नक्षत्र, तारे और ज्ञात-अज्ञात वस्तुओं का तो जन्म हो गया, लेकिन मृत्यु भी तो जरूरी है। कोई भी शक्ति यह जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं थी।
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अंत में काल को उपाय निकालने को कहा गया। उन्होंने निश्चित किया कि पाप को इसकी जिम्मेदारी सौंपी जाए। चारों युगों में से तीन- सतयुग, त्रेता और द्वापर ने पाप को प्रश्रय देने से ही मना कर दिया, लेकिन कलियुग ने उत्सुकता दिखाई।

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इसका प्रयोग दिखाते हुए कलि ने दो मित्रों का घर दिखाया। धरती पर मौजूद उन मित्रों के घर में अन्न का अभाव था। कई दिन से बच्चे भूखे थे, इसलिए दोनों मित्र शिकार की तलाश में जंगल की तरफ चल पड़े। देर शाम उन्हें एक शिकार हाथ लगा।
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मृत जीव के पास एक सिक्का भी पड़ा था। शिकार और सिक्का पाकर दोनों के चेहरे चमक उठे। एक ने दूसरे से कहा कि इस सिक्के से बाजार से कुछ खाने को ले आओ, ताकि भूख-प्यास मिटे। एक बाजार चला गया और दूसरा जंगल में पेड़ के नीचे शिकार के पास बैठ गया।

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बाजार से उसने लड्डू खरीदे। अचानक उसे ख्याल आया कि अगर मैं अपने मित्र को मार दूं, तो शिकार और सिक्का, दोनों मेरा ही होगा। यह सोचकर उसने लड्डू में जहर मिला दिया। दूसरे मित्र ने सोचा कि बाजार से आ रहे मित्र को क्यों न मार दूं।

फिर सब कुछ मेरा ही हो जाएगा। उसे अपना मित्र जैसे ही आता दिखाई दिया, उसने तीर चला दिया। मित्र वहीं ढेर हो गया। उसके मर जाने के बाद वह लड्डू खाने के लिए बैठा। जैसे ही उसने लड्डू खाए, उसके भी प्राण पखेरू उड़ गए।
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