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बाप की नसीहत ने इस तरह बदल दी बेटे की जिंदगी

Fri, 28 Nov 2014 03:36 PM IST
राजस्थानी लोककथा
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बारह-तेरह साल के उस किशोर को बहुत क्रोध आता था। नाम था उसका कुंअर पाल। पिता मानसिंह ने उसे बहुत समझाया, पर उसका क्रोध न छूटा। हारकर एक दिन उन्होंने अपने बेटे को ढेर सारी कीलें देते हुए कहा, जब भी तुम्हें क्रोध आए, तो घर के सामने लगे पेड़ में कीलें ठोक देना।
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पहले दिन लड़के ने पेड़ में तीस कीलें ठोकीं। अर्थात उसे तीस बार क्रोध आया। कीलों से पेड़ पर बने निशानों को देख पता नहीं, उसे क्या विचार आया कि वह क्रोध को रोकने लगा। अगले दिन उसने बीस कीलें ठोकीं। उसके अगले दिन पंद्रह और फिर बारह, दस, नौ की संख्या तक आते-आते कुछ ही कुछ हफ्तों में कीलें ठोकना रुक गया। एक दिन उसने पेड़ में कोई कील नहीं ठोकी। उस दिन कुंअर पाल के मन में अद्भुत शांति थी।

उसे बोध होने लगा कि पेड़ में कील ठोकने के बजाय क्रोध पर नियंत्रण करना आसान था। एक समय ऐसा आया, जब उसने पूरे हफ्ते पेड़ में एक भी कील नहीं ठोंकी। जब उसने अपने पिता को यह बताया, तो पिता ने कहा कि वह सारी कीलों को पेड़ से निकाल दे। लड़के ने मेहनत करके पेड़ से सारी कीलें खींचकर निकाल दीं। जब उसने पिता को काम पूरा हो जाने के बारे में बताया, तो पिता बेटे का हाथ थामकर उसी पेड़ के पास गए।
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पिता ने पेड़ को देखते हुए बेटे से कहा, तुमने अच्छा काम किया, पर पेड़ के तने पर बने सैकड़ों कीलों के निशानों को देखो। अब यह पेड़ इतना खूबसूरत नहीं रहा। हर बार जब तुम क्रोध किया करते थे, तब इसी तरह के निशान दूसरों के मन पर बन जाते थे। अगर तुम किसी के पेट में छुरा घोंपकर बाद में हजारों बार माफी मांग लो, तब भी घाव का निशान वहां हमेशा बना रहेगा।
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