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जब कृष्ण के भक्त को मंदिर के जूठे बर्तन साफ करने पड़े

Sat, 08 Feb 2014 08:31 AM IST
शिवकुमार गोयल
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ब्रह्मनिष्ठ संत स्वामी दयानंद गिरि शास्त्रों के प्रकांड ज्ञाता थे। वह अक्सर कहा करते थे कि मनुष्य हर प्रकार के अभिमान से दूर रहकर सदैव विनम्रता का व्यवहार करे। एक बार स्वामी जी नाथद्वारा (राजस्थान) पहुंचे।
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श्रीनाथ जी के दर्शन के बाद वह भिक्षा (भोजन) प्राप्त करने मंदिर के भंडारे में पहुंचे। वहां भोजनालय का प्रबंधक किसी से कह रहा था, आज बर्तन साफ करनेवाला कर्मचारी नहीं आ पाया है। ऐसी स्थिति में क्या होगा? स्वामी जी ने जैसे ही यह सुना, तो वह जूठे बर्तन साफ करने में जुट गए। भंडारे का व्यवस्थापक और अन्य संतगण उनकी सेवा भावना से बहुत प्रभावित हुए।

उसी शाम मंदिर के सभागार में विद्वानों के बीच संस्कृत में शास्त्र चर्चा का आयोजन था। इसमें अनेक संत और विद्वान भाग ले रहे थे। स्वामी दयानंद गिरि एक कोने में जा बैठे। उन्होंने चर्चा के बीच में खड़े होकर विनयपूर्वक कहा, आप लोग प्रश्न का उच्चारण ठीक ढंग से नहीं कर रहे। उन्होंने शुद्ध उच्चारण भी बता दिया।
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मंदिर समिति के अध्यक्ष ने देखा कि यह तो वही संत है, जो थोड़ी देर पहले जूठे बर्तन साफ कर रहा था, तो वह हतप्रभ रह गया। जब उसे पता चला कि वह स्वामी दयानंद गिरि महाराज हैं, तो वह उनके चरणों में गिरकर क्षमा मांगने लगा। स्वामी जी ने कहा, श्रीनाथ जी के भक्तों के जूठे बर्तन धोकर मैंने पूर्व जन्म के संचित पापों को ही धोया है। साधु के लिए कोई भी काम बड़ा या छोटा नहीं होता।
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