भामंडल नामक राजा थे तो धर्मात्मा, पर अक्सर प्रमाद में ग्रस्त रहते थे। संत कहते, आप पूजा-उपासना करते हैं, शास्त्रों का अध्ययन करते हैं, यह अच्छी बात है, पर अपनी बढ़ी हुई आयु को देखते हुए राजकुमार को राज्य सौंपें और शेष जीवन आत्मोद्धार में लगाएं।
राजा उत्तर देते, महाराज, यदि मैंने राज्य त्याग दिया, तो मेरे वियोग में रानी जीवित नहीं रहेंगी और प्रजा का भी ठीक ढंग से पालन नहीं हो सकेगा। इसी आशंका से मैं यह दायित्व नहीं छोड़ना चाहता।
एक बार उनके गुरु महल में पधारे। उन्होंने शास्त्रों का उद्धरण देते हुए कहा, भामंडल, सुयोग्य राजकुमार राज्य संभालने लायक हो गया है। अब अपनी आयु को देखते हुए राज्य का दायित्व उसे सौंपो और भोग से विरत हो जाने का संकल्प लो। यदि ऐसा नहीं करोगे, तो भोगों के पाप के भागी बनोगे।
राजा ने अहंकार में आकर उत्तर दिया, गुरुदेव, मैंने यज्ञ और ध्यान के बल पर ऐसे पुण्य अर्जित कर लिए हैं कि भयंकर-से-भयंकर पापों को भी क्षण भर में भस्म कर डालूंगा।
गुरु यह सुनकर हतप्रभ हो उठे। उन्हें आभास हो गया कि राजा का अहंकार मृत्यु को खुला आमंत्रण दे रहा है। कुछ ही क्षण बाद तेज गड़गड़ाहट के साथ आकाशीय बिजली महल पर गिरी और राजा काल के गाल में समा गए। पद्मपुराण में कहा गया है कि सत्ता के मद में चूर होकर यम को चुनौती देने वाले को कोई शक्ति नहीं बचा सकती है।