केरल की लंबी पदयात्रा करते हुए आचार्य शंकर ओंकारेश्वर में नर्मदा किनारे कुछ समय गुरु गोविंदपाद के पास रहे और फिर काशी विश्वनाथ के लिए निकल पड़े। काशी में दर्शन और साधना की विभिन्न धाराओं के विद्वानों से विमर्श करते हुए वह महिष्मति नगर (बिहार के महिषी) में आचार्य मंडन मिश्र से मिलने गए। आचार्य मिश्र के घर पर विद्या और तप का अद्भुत माहौल था।
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मंडन मिश्र को आचार्य शंकर ने शास्त्रार्थ के लिए कहा। कहते हैं कि शास्त्रार्थ महीनों तक चला। अंतत: मंडन मिश्र के गले में पड़ी फूलों की माला मुरझाने लगी। उस समय शास्त्रार्थ के अनुष्ठान में समझा जाता था कि दोनों विद्वानों में से जिसके गले की माला मुरझाने लगे, उसे हार की ओर बढ़ता हुआ मान लिया जाए।
आचार्य मंडन मिश्र को हारता देख उनकी पत्नी भारती मिश्र ने आचार्य शंकर से कहा, महात्मन्, अभी आपने आधे ही अंग को जीता है। भारतीय परंपरा में पति-पत्नी, दोनों एक ही जीवन और सत्ता के अंग होते हैं। आप मुझे भी पराजित कर सकें, तो आप पूर्ण विजयी कहला सकेंगे।
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आचार्य शंकर ने चुनौती स्वीकार की। मंडन मिश्र की पत्नी भारती ने उनसे प्रश्न करने प्रारंभ किए। दोनों में महीनों शास्त्रार्थ चला। भारती ने कामकला से संबंधित प्रश्न भी पूछे। आचार्य शंकर बाल-ब्रह्मचारी थे, काम से संबंधित प्रश्नों के उत्तर वह कहां से देते? इस पर उन्होंने कुछ दिनों का समय मांगा और संन्यासी का शरीर छोड़कर परकाया में प्रवेश करके काम के रहस्यों को समझा।
इस विधा का ज्ञान प्राप्त कर उन्होंने अपनी संन्यासी काया से ही भारती देवी को हराया। मंडन मिश्र और उनकी पत्नी भारती ने इस शास्त्रार्थ के बाद आचार्य शंकर का ही शिष्यत्व स्वीकार किया। शंकर मठों में आज भी भारती देवी को शक्ति का प्रतीक समझा जाता है।