संत तुलसीदास ने लिखा है, प्रभुता पाई काहि मद नाहीं। अर्थात किसी भी तरह से धन, पद, सत्ता या विद्या पाते ही आदमी के अंदर अभिमान पैदा हो जाता है कि वह सबसे बड़ा है। जब हम यह समझ लें कि धन-संपत्ति हमें भगवान की कृपा से प्राप्त हुई है और हम उस संपत्ति के स्वामी नहीं हैं, तभी हम अहंकार से बच सकते हैं।
एक गृहस्थ व्यक्ति परिश्रम कर दुकान से इतना कमा लेता था कि अपने परिवार का पालन कर सके। उसके घर का दरवाजा संतों-अतिथियों के लिए हमेशा खुला रहता था। एक दिन उसने किसी सौदे में लाखों रुपये कमा लिए। रुपये के साथ-साथ अभिमान भी उसके हृदय में आ बसा। उसने घर के दरवाजे बंद कर दिए और द्वार पर एक कुत्ता रख लिया, जो आनेवालों पर भौंकता था।
एक संत के प्रति वह अत्यंत आदर भाव रखता था। वह कभी नगर में आते, तो उसके घर पहुंचकर सत्संग-प्रवचन करते। इस बार भी वह गृहस्थ के मकान पर पहुंचे। द्वार की सांकल बजाई, तो अंदर से कुत्ते ने भौंककर उन्हें चौंका दिया। वह वापस लौटकर मंदिर में चले गए।
सेठ को पता चला, तो वह उनके लिए भोजन व फल लेकर मंदिर पहुंचा। संत ने कहा, यह भोजन ले जा। पहले विनम्रता से भोजन कराता था, तो हमें अनूठी सुगंध आती थी, अब अहंकार रूपी दुर्गंध ने इस भोजन को सारहीन बना दिया है। संत के शब्दों ने सेठ का अहंकार दूर कर दिया।