गुरु गोविंद सिंह वन में बैठे एकांत चिंतन में लीन थे। उनके मन में देश, समाज और संस्कृति के उत्थान के लिए योजनाओं और कामों के विचार गूंज रहे थे। तभी उन्होंने देखा कि यमुना को पार कर उनका कोई शिष्य उनकी ओर आ रहा है। जब वह पास आया, तो उन्होंने उसे पहचान लिया। उस शिष्य का नाम रघुनाथ था। वह काफी संपन्न और ऐश्वर्यशाली था। उसे अपनी धन-संपदा का भी अभिमान था।
पास आकर उसने गुरु को प्रणाम किया, और वहीं पास में बैठ गया। गुरु ने पूछा, आओ रघु, कैसे आए हो? वह बोला, सुना कि आप हम लोगों को छोड़कर एकांत वन में जा रहे हैं। इसलिए विचार आया कि आपकी कुशल-क्षेम पूछ आऊं।
गुरु गोविंद सिंह ने कहा, मेरी कुशल क्या जानना है रघु। कुशल तो मेरे उन बंदों की पूछ, जो अपना सारा समय और सामर्थ्य लोगों को जगाने में लगाते हैं। यह कहकर वह भोजन के लिए उठे। उनका आहार देखकर रघु ने कहा, गुरुजी, आप इस रूखे-सूखे भोजन से निर्वाह कर रहे हैं।
गोविंद सिंह ने तत्काल कहा, प्रेम का पकवान है यह। इन्हें एक भाई दे गया है। यह सुनते ही रघुनाथ ने कहा, तो मैं भी आपकी सेवा में एक तुच्छ भेंट अर्पित करता हूं। और उसने अपने दोनों हाथों के हीरे जड़े कड़े उतारे और गुरुजी के सामने रख दिया।
गुरु ने उसके चेहरे की ओर देखा और कड़ों को झाड़ी में फेंक दिया। रघु ने कहा, अभी मेरे पास बहुत संपत्ति है। जितनी कहें, उतनी मैं आपको दे सकता हूं। गुरु बोले, मुझे संपत्ति की नहीं, बंदों की जरूरत है, जो समाज के काम में जुट सके। यह सुनकर रघुनाथ को सच्चाई का बोध हुआ। उसने तत्काल समाज सेवा का प्रण ले लिया। गुरु जी ने उसे गले से लगा लिया।