बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला से उनकी मां पूछ रही थी, बेटा! यदि तुम्हारा कोई शत्रु तलवार लेकर मेरी ही गरदन काटने आ जाए, तो तुम क्या करोगे?’ यह सुनकर सिराज को अटपटा लगा। आवेश में भरकर उसने कहा, मां आज ऐसी अनहोनी बात क्यों पूछ रही हो?
भले ही मेरा अंग्रेजों से युद्ध चल रहा हो, पर आपने तो किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा है। आप पर हाथ उठाने का यदि किसी ने प्रयास किया, तो उसका हाथ ही अलग कर दूंगा, फिर उसे मौत के घाट भी उतारा जाएगा।
मां जैसे सिराजुद्दौला की परीक्षा लेना चाह रही थी, वह बोली, लेकिन यह भी तो संभव है कि दुश्मन संख्या और शक्ति में तुमसे ज्यादा हो?
नहीं मां! ऐसी बात नहीं। मैं समझ नहीं पा रहा कि आज आपको मेरी शक्ति पर संदेह क्यों हो रहा है? मुझे संकट में देखकर मीर जाफर ने अवश्य मेरे विरुद्ध षड्यंत्र कर दिया है। और मुझे परास्त करना चाहता है, पर मैं आपकी ओर से जरा भी उदासीन नहीं हूं। विश्वास रखो मां! वह मुझसे कितना ही शक्तिशाली शत्रु क्यों न हो, पर मैं उसे मौत के घाट उतारूंगा।
यह सुनकर मां को संतोष हुआ। उसने कहा, बेटा सिराज! मैं तुम्हें कई दिनों से निराश देख रही हूं। मीर जाफर के षड्यंत्र से तुम्हारे हौसले पस्त हो गए हैं। तुम्हारी मातृभूमि पर शत्रु हथियार उठाए खड़ा है। वह मातृभूमि अकेले तुम्हारी ही नहीं, मुझ जैसी सैकड़ों माताओं की भी है।
मां की बात बेटे को चुभ गई। वह मां का आशय समझ चुका था। शत्रुओं को पछाड़ने के लिए वह आतुर हो उठा। अब वह एक क्षण की भी देर नहीं करना चाहता था। वह उठा और तुरंत बाहर निकल गया। उसका कवच ही उसके शव का आवरण बना।