ग्यारह दिसंबर ओशो का जन्मदिन है। अपने जन्मदिन के अवसर पर प्रवचन देते हुए ओशो ने कहा था, मेरे प्रिय आत्मन, मैं आपको आज क्या उपहार दूं, क्योंकि आज के दिन मैंने यह शरीर धारण किया था। आज के दिन मैंने अस्तित्व के दर्शन किए थे। मैं जब इस विषय में सोच रहा था, तो मुझे गौतम बुद्ध के वचन का स्मरण आया कि जीवन में सर्वश्रेष्ठ भेंट होती है, ध्यान की, जागरण की, होश की। वही मैं आज आपको भेंट करना चाहता हूं। मेरा संदेश है, ध्यान।
इस एक शब्द में इतनी शक्ति है कि यह जीवन का आमूल रूपांतरण कर देता है। यह आपको पूरी तरह बदल सकता है। नया रूप है यह। इसी से निकलता है, प्रेम और उत्सव। इसी शक्ति से घटित होता है, सृजन। इसी से निःसृत होती है, करुणा और मैत्री। इसी एक छोटे-से शब्द में सभी कुछ समाया है। इसी को अपनाने से पूरी मनुष्यता को शांति, सौमनस्यता और मैत्री का सुवास उपलब्ध हो सकता है।
ओशो कहते हैं, दुनिया की बहुत-सी प्रयोगशालाओं के निष्कर्ष यह साबित कर चुके हैं कि प्रेम जीवन की अभिवृद्धि करता है। जिस गुलाब के पौधे को तुमने प्रेम किया, उसके फूल बड़े होंगे। होने ही चाहिए, क्योंकि तुमने उसे गरिमा दी; उससे प्रेम किया। पौधे के प्राण पुलकित हैं। वह तुम्हें प्रसन्न करना चाहता है; तुमने उसे प्रसन्न किया। तुमने उसे प्रेम दिया; वह तुम्हें भी यह लौटाना चाहता है- एक बड़े फूल की भांति खिलकर। वह और भला क्या कर सकता है-एक बड़े फूल की भांति ही तो खिलेगा।
प्रेम जीवन है। प्रेम से रहित जीवन का कोई अर्थ नहीं है। और प्रेम से भरी मृत्यु भी सार्थक हो जाती है। प्रेम से भरी मृत्यु में भी एक काव्य प्रकट होता है-अलौकिक।