शरशैया पर लेटे बाणों से बिंधे भीष्म के प्राण धीरे-धीरे निकल रहे थे। शरीर के जिस हिस्से से उनके प्राण निकलते, वहां के बाण अपने-आप शरीर छोड़ देते। उन्होंने अर्जुन से कहा, वत्स, थोड़ा पानी पिलाओ। अर्जुन ने तत्काल धरती में तीर मारा और वहां से निकली जलधारा सीधे पितामह के मुंह में गिरी।
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प्यास बुझने पर वह बोले, जीवन तो नदी के समान है। इसकी धारा मोड़ने के लिए कितना ही संघर्ष करें, धारा अपने रास्ते ही जाएगी। इसलिए जीवन से लड़ें नहीं, उसके साथ सामंजस्य बिठाएं। इसे समझाते हुए उन्होंने एक कथा सुनाई। कबूतर को अपना आहार बनाने के लिए बाज ने उसका पीछा किया। कबूतर राजा शिबि की शरण में पहुंचा। पीछे-पीछे बाज भी आ गया। उसने कहा, महाराज! यह मेरा भक्ष्य है। इसकी रक्षा न करें।
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शिबि ने कहा, मैंने इस पक्षी को अभय दिया है। तुम्हें भूख मिटाने के लिए मांस चाहिए, सो मैं इस कबूतर के वजन के बराबर मांस अपने शरीर से काटकर देता हूं। उन्होंने एक तराजू मंगाई और उसके एक पलड़े में कबूतर को रखा, दूसरे में अपने शरीर से मांस काटकर डालने लगे। काफी मांस काट दिया, किंतु दूसरा पलड़ा जरा भी नहीं हिला। आखिर बाज ने कहा, राजन, आप कितना मांस दे पाएंगे?
आपके बाद तो कबूतर को अपनी चिंता स्वयं ही करनी पड़ेगी। जब तक एक प्राणी नहीं मरेगा, संसार में दूसरा प्राणी नहीं आएगा। यह सुनकर राजा को लगा कि कहीं कबूतर को बचाकर मैं गलती तो नहीं कर रहा! शिबि की अंतरात्मा ने कहा, संसार का यही नियम है। जीवित प्राणी यही सोच सकते हैं, पर मनुष्य जीवन के नियम से आगे जीवन का अर्थ भी खोज सकता है। मनुष्य जीवन को अपनी गति से चलने देकर संवेदना भी जता सकता है।