महर्षि अरविंद से एक दिन एक जिज्ञासु ने पूछा, क्या ईश्वर को प्रत्यक्ष देखा जा सकता है? महर्षि ने उत्तर दिया, जिस प्रकार प्रेम और सुख की मात्र अनुभूति की जा सकती है, उसी प्रकार सच्चा प्रेम करना सीखो, ईश्वर की अनुभूति स्वयं होने लगेगी।
कुछ क्षण रुककर उन्होंने फिर कहा, क्या कोई वायु, गंध आदि का साकार रूप देख सकता है? यदि कोई सच्चे हृदय से भगवान के दर्शन के लिए उसके प्रेम में तड़पने लगे, तो उसे सहज ही प्रभु के दर्शन की अनुभूति होने लगती है।
महर्षि अरविंद ने आगे कहा, हम सभी वस्तुओं में ईश्वर का अनुभव कर रहे हैं। सू्र्य, चंद्र, तारे, वृक्ष, वनस्पति, समुद्र और सरिताएं उसी का गुणगान कर रही हैं। यह विशाल विश्व उसका खेल ही नहीं है, उसमें ज्ञान की गहराई छिपी है। सांसारिक सुखों के झूठे आकर्षण ने आज मनुष्य को भ्रमित कर भटकाया है। इसी भ्रामक स्थिति के कारण मानव अपने दुख और कष्ट को ही सुख मानने लगा है।
वह कहते हैं, शाश्वत प्रेम का अभ्यासी व्यक्ति मानवीय वस्तुओं को भी ईश्वरीय बना देने की क्षमता रखता है। सच्चा प्रेम पृथ्वी और स्वर्ग के बीच ज्वलंत शृंखला के समान है। प्रेम ही पृथ्वी पर ईश्वर का देवदूत है। प्रेम के स्वर्ण पंखों में वह शक्ति है, जो अनेक लोगों तक पहुंचकर सत्य का साक्षात्कार कर सकती है।
अरविंद अक्सर कहा करते थे, आत्म तत्व को जान लेना ही सच्चा ज्ञान है, मुक्ति का साधन है।