सभी धर्मग्रंथों में सेवा-सहायता को सर्वोपरि धर्म बताया गया है। महर्षि वेदव्यास ने अष्टादश पुराणों में लिखा है, परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम। अर्थात परोपकार पुण्य है और दूसरों को पीड़ित करना पाप। कुछ प्राप्त करने की इच्छा से की गई सेवा को शास्त्रों में निष्फल बताया गया है।
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कहा गया है, यदि सेवा कर्तव्यपालन या आत्मिक प्रसन्नता के लिए की जा रही है, तो वह असली सेवा है और अगर किसी लोभ से की जा रही है, तो वह महज दिखावा है। उसका फल नहीं मिलता।
ईशोपनिषद में कहा गया है, सभी प्राणियों में आत्मा के दर्शन का जो भाव है, वही सेवा का मूलाधार है। सच्चा मानव वही है, जो किसी भूखे-प्यासे व्यक्ति को देखकर भोजन और पानी देने को तत्पर रहता है। इस प्रकार की निष्काम सेवा की भावना बहुत ही पुण्यवान व्यक्ति में पैदा होती है।
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आध्यात्मिक विभूति हनुमानदास पोद्दार भीषण ठंड के दिनों में आधी रात के समय गीता वाटिका (गोरखपुर) से चुपचाप निकलते थे और ठंड से सिकुड़ रहे गरीबों को कंबल-चादर ओढ़ा दिया करते थे। एक बार एक पत्रकार ने कंबल ओढ़ाने का चित्र ले लिया।
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पोद्दार जी ने विनम्रता से उसे कहा, यह चित्र अखबार में मत छापना, न ही इस बारे में किसी दूसरे को बताना, नहीं तो मैं पुण्य की जगह पाप का भागी बनूंगा। यह सुनकर पत्रकार उन्हें देखता ही रह गया।