एक वैज्ञानिक ईश्वर के ठीक पास पहुंच गया। वह बोला, ईश्वर, अब हमें तुम्हारी कोई जरूरत नहीं है। हमने इतनी उन्नति कर ली है कि अब हम खुद ही तुम्हारी तरह कोई भी चीज बना सकते हैं। यहां तक कि हम चाहें, तो तुम्हारी तरह एक नया ईश्वर भी गढ़ सकते हैं।
ईश्वर कुछ देर चुप रहा, फिर मुस्कराते हुए बोला, अच्छा! बताओ, तुम क्या कर सकते हो? वैज्ञानिक ने कहा, हम मिट्टी से जीवन की रचना कर सकते हैं। तरह-तरह के प्राणी रच सकते हैं। उनमें प्राण फूंक सकते हैं। सभी तरह के जीवों और उनके नर-मादा रूपों की रचना कर सकते हैं।
उन जीवों का भी निर्माण कर सकते हैं, जो अब लुप्त हैं, लेकिन किसी समय उनका अस्तित्व था। ईश्वर इन बातों को सुनकर खुश हुआ और बोला, यह तो बहुत अच्छी बात है मेरे बच्चे। अब मेरा काम आसान हो जाएगा। तुम ही वह सब करने लगोगे, जो मुझे करना पड़ता है। कुछ पल रुककर उसने फिर कहा, अच्छा मुझे दिखाओ कि तुम ऐसा कैसे करते हो।
वैज्ञानिक नीचे झुका और अपनी परखनली में थोड़ी-सी मिट्टी भरने लगा। उसे परखनली में मिट्टी भरते देख ईश्वर ने टोका, रुको! जरा ठहरो! वैज्ञानिक रुक गया और ईश्वर की तरफ देखने लगा। अपनी बात पूरी करते हुए ईश्वर बोला, यह तो मेरी मिट्टी है! तुम अपनी मिट्टी से ही यह काम करके दिखाओ, तब तुम्हारा दावा सही होगा!