सभी धर्मों में मानव जीवन को क्षणभंगुर बताते हुए हर क्षण सत्कर्म और अपने कर्तव्यपालन में लगे रहने की प्रेरणा दी गई है। कहा गया है कि भगवान और मृत्यु को हर क्षण याद रखना चाहिए।
नारायण स्वामी ने कहा है, दो बातों को भूल मत, जो चाहता कल्याण। नारायण इक मौत को दूजे श्रीभगवान। उर्दू के कवि जौक तो दुनिया को सराय बताते हुए लिखते हैं, दुनिया है सराय इसमें बैठा तू मुसाफिर है, और जानता है यहां से जाना तुझे आखिर है।
सारी चेतावनियों के बावजूद मानव न भगवान को याद रखता है, न मौत को। वह किसी भी तरह धन-संपत्ति अर्जित करने और ऐशो-आराम की जिंदगी बिताने के सपनों में घिरा रहता है। 'राम नाम सत्य है' उसके मुंह से कुछ क्षणों के लिए तभी निकलता है, जब वह किसी के शव के साथ श्मशान घाट तक जाता है।
चिता को आग देते वक्त तक उसे आभास होता है कि देखे कभी भी आकर दबोच सकती है। वह वहां बैठा वैराग्य भाव से संसार के झूठे होने की बात करता है, पर वहां से लौटते ही सुखों की खोज में लग जाता है।
संत-महात्मा समय-समय पर पल-पल का सदुपयोग करने की प्रेरणा देते हैं। धन व सांसारिक सुखों के अहंकार से ग्रसित व्यक्ति किसी की बात पर ध्यान नहीं देता। संत कबीर इसलिए कहते हैं, कबीर नौबत अपनी दिन दस लेहु बजाय। यह पुर पट्टन, यह गली बहुरि न देखन आय।