राजा भोज ने अपने राज्य में यह घोषणा करा रखी थी कि यदि किसी नागरिक के साथ शासन का कोई कर्मचारी अन्याय करता है, तो इसकी सूचना मंत्री को दी जाए।
प्रजा को सताने वालों को कठोर दंड दिया जाएगा। एक दिन एक व्यक्ति ने किसी कर्मचारी की शिकायत की। मंत्री ने जांच के बाद उस कर्मचारी को राज्य की सीमा से बाहर निकल जाने का दंड सुनाया।
राजा भोज कहा करते थे, उत्पन्न होते ही बैरी और रोग का जो शमन नहीं करता, वह रोग और शत्रु के प्रबल होते ही एक दिन नष्ट हो जाता है। उनका मानना था, उस राज्य की दुर्गति तय है, जिसका राजा अविवेकी है, और जो प्रजा की भलाई के जगह अपने परिवार की सुख-सुविधा में लगा रहता है।
जिस राजा का मंत्री असंयमी और दुष्ट हो, वह एक दिन अपने राज्य से हाथ धो बैठता है। दुष्ट मंत्री के कारण प्रजा के कष्टों का समाचार राजा तक नहीं पहुंच पाता। इससे प्रजा में असंतोष पनपता है। यह राजा के पतन का कारण बनता है। इसलिए राजा को मंत्री के अलावा भी अन्य संपर्क-साधनों से जनता की समस्याओं से अवगत होने का प्रयास करते रहना चाहिए।
राजा भोज संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और दानशील तो ऐसे थे कि जरूरतमंदों के घरों में चुपचाप अन्न-वस्त्र पहुंचाकर अत्यंत संतोष की अनुभूति करते थे।