कोसल का राजा ब्रह्मदत्त जब शिकार पर निकलता था, तब उसके साथ बड़ी भारी सेना रहती थी। उनके पीछे-पीछे लोग भी जाते। इस तरह बहुत से वन्यजीवों का प्रतिदिन संहार होता। काशी के समीप मृगदाव नामक वन (आधुनिक सारनाथ) में नंदीय नाम का मृग इस महासंहार से दुखी हुआ।
उसने मृग-जंतुओं की एक सभा बुलाई। सबने निर्णय किया कि इसमें-से एक मृग प्रतिदिन राजा से मिलने स्वयं चला जाए। इससे वन्य मृग और पक्षियों का भयंकर संहार रुक जाएगा। राजा ने भी इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।
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बहुत दिनों बाद नंदीय की बारी आई। पर उसके शांत और सौम्य भाव ने राजा का मन बदल दिया। वह इतना प्रभावित हुआ कि उसके धनुष-बाण हाथ में ही रह गए, वह उसका संधान ही न कर सका। नंदीय बोला, राजन! आप मुझे मारते क्यों नहीं? राजा से कोई उत्तर देते नहीं बना।
नंदीय ने फिर दोहराया, तो राजा ने कहा, पता नहीं, मैं तुम्हें क्यों नहीं मार सकता? तुम्हें पूर्ण आयु मिले। राजा के इस प्रकार कहने पर नंदीय बोला, सो तो ठीक है, पर क्या आप बाकी मृगों को भी इसी प्रकार अभय नहीं दे सकते? इस पर राजा ने हामी भर दी।
नंदीय ने कहा, क्या आप हवा में उड़ने वाले पक्षियों तथा जल में रहने वाली मछलियों को भी यह आश्वासन दे सकते हैं? राजा ने कहा, क्यों नहीं? और ब्रह्मदत्त ने सारे राज्य में घोषणा करा दी कि अब से सभी वन्य जंतु, पक्षी एवं जलचरों की हिंसा न की जाए।
फिर वह नंदीय के सामने हाथ जोड़ कर बोले, आपमें ऐसी क्या क्षमता है कि मैं आपके सामने नतमस्तक हो गया? नंदीय ने कहा, कुछ नहीं। मैं समझता हूं कि मुझे किसी भी क्षण मृत्यु का भय नहीं हुआ। शायद इसीलिए मैं दूसरों के लिए भी अभय प्राप्त कर सका।