एक आदमी के घर एक संन्यासी आया। रात उसने मेजबान से कहा, तुम यहां क्या छोटी-मोटी खेती में लगे हो। साइबेरिया में जमीन इतनी सस्ती है कि मुफ्त ही मिलती है। तुम साइबेरिया चले जाओ। वहां हजारों एकड़ जमीन मिल जाएगी। उस आदमी ने दूसरे ही दिन साइबेरिया की राह पकड़ी। जमीन खरीदने की बात चली, तो लोगों ने कहा कि जितना पैसा लाए हो, रख दो; और सुबह सूरज उगते ही निकल पड़ना। सूरज डूबते तक जितनी जमीन घेर सको, घेर लेना। वह तुम्हारी हो जाएगी।
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रात भर सो न सका वह। योजनाएं बनाता रहा और सुबह होते ही भागा। उसने सोचा कि चलने से तो आधी ही जमीन घेर पाऊंगा, दौड़ने से दोगुनी हो सकेगी। तो वह भागा...भागा...। सोचा कि दोपहर होते ही लौट जाऊंगा, ताकि सूरज डूबते-डूबते पहुंच जाऊं। दोपहर तक वह मीलों चल चुका था। उसने सोचा कि लौटना चाहिए; पर सामने और सुंदर जमीन...थोड़ी-सी और घेर लूं। दोपहर बीत गई, पर लौटने का मन नहीं होता, क्योंकि आगे उपजाऊ भूमि है।
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कुछ मील और दौड़कर वह लौटने लगा। सुबह से दौड़ रहा था, हांफ रहा था, घबरा रहा था कि सूरज डूबते तक पहुंच पाएगा या नहीं। उसने सारी ताकत लगा दी। पागल होकर वह दौड़ा। और सूरज डूबने लगा। ज्यादा दूरी भी नहीं रह गई, लोग दिखाई पड़ने लगे।
उसने आखिरी दम लगा दिया। इधर सूरज डूब रहा है, उधर वह भाग रहा है। जब उसका हाथ उस जमीन के टुकड़े पर पहुंचा, जहां से भागा था, तभी सूरज डूब गया। वहां सूरज डूबा और यहां यह आदमी भी मर गया। और गांव के लोग आपस में बातें करने लगें, लोग आ जाते हैं जमीन घेरने। मगर अब तक एक भी ऐसा नहीं आया, जो जमीन का मालिक बन पाया हो।