महाकवि के रूप में जब कालिदास को सम्राट विक्रमादित्य के दरबार में मान्यता मिली, तो वह सबसे पहले राजकुमारी विद्योत्तमा के पास गए। विद्योत्तमा वही महिला थीं, जिनका विवाह लोगों ने वर्षों पहले शास्त्रार्थ में हार जाने की कुंठा में छल-बल के सहारे काली (कालिदास) जैसे मूर्ख युवक से करा दिया था।
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दरअसल, उस समय शास्त्रार्थ में हरा देने वाले युवक से ही विवाह करने की बात प्रसिद्ध थी। जो विद्वान विद्योत्तमा से शास्त्रार्थ में हार गए, उन्हीं में से कुछ ने बदला लेने के लिए काली जैसे मूर्ख युवक से विद्योत्तमा का विवाह करा दिया था।
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लेकिन जल्दी ही रहस्य खुल गया, और विद्योत्तमा ने पति काली को प्रताड़ित और अपमानित कर तत्काल महल से निकाल दिया। उस घटना के बाद युवक ने संकल्प लिया कि वह विद्या और शास्त्रों में निष्णात होकर ही रहेगा। संयोग से न्याय और तर्क के विद्वान आचार्य उदयन उसे मिल गए और उन्होंने उसे कुछ सूत्र समझाए। उन सूत्रों का अभ्यास करते हुए काली ने विद्यारंभ किया और जल्दी ही विद्वत्ता हासिल कर ली।
आचार्य की हर परीक्षा में खरा साबित होने के बाद जब कालिदास उनके चरणों में विनत हुए, तो आचार्य ने कहा, मैं तो मार्ग दिखाने वाले दीपक की तरह हूं। आभार तो उस देवी का मानो, जिसने तुम्हें प्रताड़ित किया। उसने अगर तुम्हारे अंदर तड़प न जगाई होती, तो तुम पेड़ की शाखा पर बैठकर उसे विपरीत दिशा से काटने वाले जड़मति ही बने रहते।
इस विषय में मतभेद हैं कि गुरु ही पारंगत कालिदास को लेकर विद्योत्तमा के पास गए थे, या नहीं। पर इसमें कोई मतभेद नहीं है कि कालिदास को प्रेरित और प्रताड़ित करने के बावजूद विद्योत्तमा ने हमेशा उन्हें अपना जीवनसाथी ही माना।