हैम्बुर्ग (जर्मनी) पहुंचकर राम बजाज और यहां से गए उसके परिजन एक रेस्त्रां में गए। उन्होंने देखा, वहां ज्यादातर मेजें खाली थीं। एक मेज पर एक युवा जोड़ा खाना खा रहा था। सामने मेज पर केवल दो प्लेट में खाना और पानी के दो गिलास रखे थे। एक अन्य कोने की मेज पर कुछ वृद्धाएं बैठी थीं।
जब भी वेटर कोई डिश लेकर आता, वह उन सबमें उसे बांट देता और महिलाएं अपनी प्लेटों में परोसे गए खाने को पूरी तरह से खाकर समाप्त कर देती थीं। बजाज परिवार के लोगों को बहुत भूख लगी थी। उन्होंने खाने के लिए बहुत कुछ मंगा लिया। जाहिर है कि खाया नहीं गया और एक तिहाई से ज्यादा खाना मेज पर छोड़ना पड़ा।
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खाना छोड़कर बजाज परिवार रेस्त्रां से निकल रहे थे। तो पास ही खाना खाकर उठी महिलाओं में से एक वृद्धा ने उन्हें खाने की बर्बादी को लेकर टोका। राम बजाज के भारतीय मेजबान ने थोड़े गुस्से से उस महिला को जवाब दिया, हमने खाने का पैसा दिया है। यह आप लोगों का मसला नहीं है कि हम कितना खाते हैं या कितना छोड़ देते हैं।
महिलाएं क्रोधित हो गईं। उनमें से एक ने तुरंत किसी को फोन किया और कुछ ही देर में सोशल सिक्योरिटी संस्था का प्रतिनिधि सामने खड़ा था। मामले को जानकर उसने बजाज पर पचास यूरो का जुर्माना लगा दिया। बजाज परिवार के लोग सन्न रह गए। अधिकारी ने कहा, जुर्माना तो आपको देना ही होगा।
साथ ही, यह शपथपत्र भी दाखिल करना होगा कि आइंदा उतना ही ऑर्डर करेंगे, जितना आप लोग खा सकें। बजाज साहब ने जुर्माना भर दिया। इसके बाद अधिकारी ने नसीहत दी कि धन अवश्य ही आपका है, पर संसाधन देश और समाज की सामूहिक संपत्ति हैं। बहुत लोग हैं, जिनके पास साधन नहीं हैं। किसी को हक नहीं है कि वह संसाधनों को नष्ट करे।