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इन्द्र ने किया ऐसा काम लज्जित हुए अग्नि और वायु देव

Tue, 28 Oct 2014 11:14 AM IST
केन उपनिषद
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ब्रह्म ने देवताओं के लिए विजय प्राप्त की। हालांकि विजय ब्रह्म के कारण हुई थी, मगर देवता गर्व से भर गए और सोचने लगे कि यह विजय उनके कारण हुई है। ब्रह्म को उनके इस गर्व का पता चला, तो वह स्वयं उनके सामने यक्ष के रूप में प्रकट हुए। अपने अहंकार के कारण देवता पहचान नहीं पाए कि यक्ष कौन हैं। देवताओं ने अग्नि से कहा, पता लगाओ कि यक्ष कौन है?
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अग्नि शीघ्रता से यक्ष के पास पहुंचे। यक्ष ने उनसे पूछा, आप कौन हैं? अग्नि ने उत्तर दिया, मैं अग्नि हूं। मुझे जातवेद के नाम से भी जाना जाता है। यक्ष ने फिर पूछा, आप किस ऊर्जा के स्वामी हैं, जो इतने प्रसिद्ध हैं? अग्नि ने उत्तर दिया, जो कुछ भी इस पृथ्वी पर है, मैं उसे जला सकता हूं।

यक्ष ने उनके सामने एक तिनका रख दिया और कहा, इसे जला दें। अग्नि ने पूरी शक्ति लगा दी, पर वह तिनके को नहीं जला सके। वह लौटकर देवताओं के पास आए और अपनी विफलता की बात कही।
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देवताओं ने फिर वायु को भेजा। यक्ष ने उनके सामने भी एक तिनका रखकर उसे उड़ाने को कहा। वायु ने भी पूरी शक्ति लगा दी, पर वह तिनके को नहीं उड़ा सके। वह भी थक-हारकर देवताओं के पास वापस लौट आए। आखिर में देवताओं के अधिपति इंद्र गए।

जब इंद्र यक्ष के पास पहुंचे, तो वहां यक्ष नहीं, एक सुंदर स्त्री हिमाचल कुमारी उमा मौजूद थी। इंद्र ने उनसे पूछा, यक्ष कहां गए? वह कौन थे? उमा ने उन्हें रहस्य बताते हुए कहा कि यक्ष कोई और नहीं, स्वयं परब्रह्म ही थे। सर्वशक्तिमान लगने और दंभ रखने वालों के सामने वह अंतर्धान हो जाते हैं। वह सिर्फ उन्हीं के सामने प्रकट होते हैं, जो सहज और निरहंकार भाव से सामने आता है।
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