गणेशपुरी के विख्यात संत बाबा मुक्तानंद परमहंस सत्संग के लिए आए लोगों के साथ कुटिया में बैठे वेदांत और परमात्मा की चर्चा कर रहे थे। वहां उपस्थित एक जिज्ञासु ने पूछा, बाबा, क्या परमात्मा के दर्शन हो सकते हैं? बाबा ने कहा, तुम हर क्षण परमात्मा के दर्शन करते हो, लेकिन ज्ञानचक्षु न होने के कारण उन्हें पहचान नहीं पाते।
कुछ क्षण मौन रहकर उन्होंने फिर कहा, यह जगत परमात्मा का ही प्रतिबिंब है। वेदांत का कथन सर्वे खल्विदं ब्रह्म पूर्ण सत्य है। सर्व देश, सर्व तीर्थ, सर्व नाम परमात्मा के हैं। भूमंडल के सर्व स्थान प्रभु के क्षेत्र हैं। जगत के सभी रूपों में परमात्मा का रूप छिपा है। अनंत की महिमा अनंत, नाम अनंत, लीला अनंत, परमात्मा का कोई अंत नहीं है।
किसी भी शास्त्र का अध्ययन कर लो, पूरा नहीं होगा। कितने ही तीर्थों की यात्रा कर लो, फिर भी अनेक तीर्थ बच जाएंगे। कितनी दूर तक दृष्टि डालो, नजर असीमित ऊंचाई तक पहुंच ही नहीं सकती। ऐसी दिव्य व्यापकता, विशालता और दिव्य महिमा है भगवत तत्व की। यह क्षणभंगुर शरीर कहीं दिव्य दृष्टि के अभाव में परमात्मा को बाहर खोजते-खोजते प्राणहीन होकर दुर्लभ जीवन को निष्फल न कर डाले।
बाबा ने परमात्मा को पहचानने का उपाय बताते हुए कहा, ध्यान के निरंतर अभ्यास, अंतर्मुखी बनने से मानव में परमात्मा के दर्शन स्वतः होने लगेंगे।