महर्षि रमण दावा करते थे कि वह हर दिन ईश्वर का साक्षात्कार करते हैं। एक दिन एक भक्त ने उनसे भगवान के दर्शन कराने की प्रार्थना की। महर्षि रमण उसे एक झोंपड़ी में ले गए और वहां बैठे वृद्ध कोढ़ी की ओर संकेत कर बोले, मैं प्रतिदिन इस भगवान का साक्षात्कार कर पूर्ण रूप से आनंद की अनुभूति करता हूं।
वेदों, पुराणों, उपनिषदों में ऐसे अनेक प्रसंग मिलते हैं, जिनमें कहा गया है कि शुद्ध और निश्छल हृदय में भगवान स्वतः निवास करने को उत्सुक रहते हैं। जहां कपट, छल-छिद्र है या जिसके हृदय में राग-द्वेष, हिंसा और प्रतिशोध की भावना है, परमात्मा वहां एक पल भी नहीं रह सकते।
एक बार ईसा येरुशलम के गिरिजाघर गए। उन्होंने वहां की भव्यता और शान-शौकत देखकर शिष्यों से कहा, गिरिजाघर को कितना भी भव्य रूप दे दो, एक दिन वह गिरकर नष्ट हो जाएगा। लेकिन एक पूजास्थल है, जो कभी नष्ट नहीं होगा। प्रभु का वह शाश्वत मंदिर उन लोगों के दिल में है, जो एक-दूसरे से प्रेम करते हैं।
एक दिन ईसा ने शिष्यों से पूछा, क्या तुम मेरे उपदेशों का सार समझते हो? साइमन पतरस ने कहा, मेरे विचार में आपकी शिक्षा का सार है कि प्रत्येक मनुष्य में परमात्मा की शक्ति विद्यमान है, इसलिए हर आदमी परमात्मा का पुत्र है।
ईसा ने शाबाशी देते हुए कहा, परमात्मा तेरे अंदर है, इसलिए तू मेरी शिक्षा का मर्म जान गया है।