पंडित वेणीप्रसाद देश भर में अपनी विद्वता की धाक जमाते काशी पहुंचे। वहां के विद्वानों ने सोचा कि पंडित जी को शास्त्रार्थ में हराना असंभव है। इसलिए उन्होंने तय किया कि कबीर से शास्त्रार्थ के लिए कहा जाए। इस सोच के पीछे पंडितों का ख्याल था कि एक तीर से दो शिकार हो जाएंगे। कबीर पंडित वेणीप्रसाद से शास्त्रार्थ के लिए तैयार हो गए।
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शास्त्रार्थ तय होने के एकाध दिन बाद की ही बात है। वेणी पंडित जी अहले सुबह शौचादि के लिए बाहर जंगल की तरफ गए। संयोग से कबीर भी उधर पहुंच गए। उन्हें न जाने क्या सूझा कि वेणी पंडित को देखते ही उन्हें राम-राम कह दिया।
पंडित जी तब दिशा-मैदान से निपट कर लौट रहे ही थे। उन्होंने कबीर के अभिवादन का उत्तर नहीं दिया। कबीर ने फिर दोहराया और कोई उत्तर नहीं मिला, तो वह बार-बार राम-राम कहने लगे। पंडितजी ने गुस्सा होकर मिट्टी का एक ढेला उन्हें मारा। वेणी पंडित कबीर को पहचान न सके थे।
जब शास्त्रार्थ शुरू हुआ, तो कबीर ने आदर से पंडित जी से पूछा, मुझे आश्चर्य हुआ कि सुबह आपने राम-राम का उत्तर क्यों नहीं दिया। पंडित जी पहले तो झेंपे, फिर बोले कि उस समय मैं अपवित्र अवस्था में था। कबीर ने पूछा कि फिर कौन-सा साधन अपनाकर आप पवित्र हुए?
वेणी पंडित ने दिल्लगी-सी करते हुए कहा, भगत जी, क्या आप इतना भी नहीं जानते कि मिट्टी और पानी से हाथ धो लिए जाते हैं और शुद्ध हो जाते हैं। कबीर ने कहा, पंडित जी, मिट्टी, जल, वायु और अन्यान्य वस्तुओं में भी मलिनता रहती है।
कोई भी चीज पवित्र करने में समर्थ नहीं है। सिर्फ राम नाम का उच्चारण करने से ही कोई आदमी शुद्ध हो सकता है। कहना न होगा कि वेणी पंडित ने फिर कबीर से शास्त्रार्थ किया ही नहीं।