ईसा के एक शिष्य को शेखी बघारने की आदत थी। एक दिन वह ईसा के दर्शन को पहुंचा और बोला, आज मैं पांच गरीबों को खाना खिलाकर आया हूं। जब तक मैं किसी की सहायता न कर दूं, मुझे चैन नहीं मिलता। बिना प्रार्थना किए मुझे नींद भी नहीं आती।
ईसा ने उसे उपदेश देते हुए कहा, तुम्हारा आज का सेवा पुण्य समाप्त हो गया। जो दिखावे के लिए किसी की सहायता करता है, समझ लो कि वह नाटक करता है। किसी की सहायता गुप्त रूप से करनी चाहिए। कुछ क्षण रुककर उन्होंने आगे कहा, तुम्हारा सेवा-सहायता का कार्य इतना गुप्त हो कि बाएं हाथ को भी पता न चल सके कि दाहिने हाथ से तुमने दान दिया है या किसी की मदद की है।
ईसा मसीह सार्वजनिक प्रार्थना को महत्व नहीं देते थे। वह कहते थे, जब तुम प्रार्थना करो, तब पाखंडियों जैसा मत बनो, क्योंकि सभागृहों और चौराहों पर खड़े होकर प्रार्थना करने वालों की यही आकांक्षा होती है कि लोग उन्हें देखें और सराहें। पिता परमेश्वर गुप्त कार्यों को भी देखता है, इसलिए वह तुम्हें उन कर्मों का भी फल देगा। ढिंढोरा पीटने से कोई लाभ नहीं।
गांधी जी कहते थे, जो स्वार्थ सिद्ध करने या समाज में प्रशंसित होने के लिए किसी की सहायता करता है, वह पुण्य नहीं, पाप अर्जित करता है। किसी प्रकार का स्वार्थ अधर्म है। वैसे भी कहा गया है, अहंकार व स्वार्थ का सदैव त्याग करके की गई निष्काम सेवा ही फलदायी होती है। संपत्ति हमारी है नहीं, फिर किसी को देने में अभिमान कैसा?