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रात के अंधेरे में जिसे कंकड़ समझा था वो असल में हीरे थे

Mon, 08 Dec 2014 11:17 AM IST
अमीर अश्क
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एक बार अरब लोगों का एक काफिला रेगिस्तान से होकर गुजर रहा था। दिन में आग बरसती, तो वे सुस्ताते और रात को थोड़ी ठंडक होने पर चल पड़ते। एक रात वे ऐसे इलाके से होकर गुजर रहे थे, जहां फरिश्तों का वास था। सुनसान अंधेरी रात में उन्हें उनकी आवाज सुनाई पड़ी। फरिश्ते सौदगरों से कुछ कहना चाह रहे थे। मगर क्या कह रहे थे, उस पर गौर किए बिना पहले तो लोग सहम गए, फिर कुछ समझ में आया, तो फरिश्तों की बातें सुनने लगे।
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फरिश्तों ने उन्हें तसल्ली दी और कहा कि ये बातें मानोगे, तो भला होगा। सौदागरों ने उनकी बात मानने के लिए रजामंदी जताई। एक फरिश्ते ने उनसे कहा, रुको। वे सब रुक गए। दूसरी आवाज थी, झुको। वे झुक गए। तीसरा आदेश मिला, जमीन पर बिखरे कंकड़ बीनो और थैले भरकर चल पड़ो। उन्होंने वैसा ही किया।

उनका अंतिम निर्देश था, सुबह होने तक कहीं ठहरना मत। जब सूरज निकलेगा, तो तुम बहुत खुश होओगे, पर दुख भी कम न होगा। सौदागर शुरू में तो डरे, मगर फरिश्तों का कहा मानने के सिवा उनके पास कोई चारा भी न था। किसी प्रकार उन्होंने रात पूरी की।
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सवेरा होते ही उन्होंने देखा कि उनकी जेबों में हीरे-मोती भरे थे। वे सचमुच बहुत सुखी हुए। पर जब यह ख्याल आया कि रात के समय इसका पता क्यों नहीं चला कि वे पत्थर नहीं, हीरे-मोती बटोर रहे हैं, तो दुखी भी कम नहीं हुए। उस क्षेत्र में हीरे की खदान थी, यह यदि पता चलता, तो ऊंटों का असबाब उड़ेलकर वे हीरों से बोरे भर सकते थे।
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इसका अर्थ यह हुआ कि जिंदगी का कारवां हमेशा फरिश्तों के इलाके से गुजरता है, पर हम स्तब्ध, भयभीत, कुछ सुखी और बहुत दुखी होकर मंजिल पार करते हैं।
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