बादशाह उमर का एक बहुत ही मुंहलगा नौकर था। उसका नाम था, फरीद। वह बादशाह की दिन-रात सेवा करता रहता था। एक दिन उसके मन में विचार आया कि मैं बादशाह की सेवा में दिन-रात लगा रहता हूं, तब भी केवल पांच सिक्के ही मिलते हैं। जबकि मीर मुंशी कभी कुछ नहीं करता और पांच सौ दिरहम पा जाता है। यह तो सरासर ज्यादती है। यह भेदभाव क्यों हो रहा है, पता लगाना चाहिए। उसने यह उलझन बादशाह उमर को कह सुनाई। उमर ने हंसकर कह दिया कि किसी दिन मौके पर बताऊंगा।
एक दिन व्यापारियों का घोड़ों का काफिला बादशाह उमर की सीमा से गुजर रहा था। बादशाह ने अपने सेवक को भेजा कि जाकर मालूम करो कि यह काफिला कहां जा रहा है? नौकर गया और आकर बतलाया कि हुजूर वह काफिला सीमा के पास के कंधार जा रहा है।
अब बादशाह ने मीर मुंशी को भेजा। उसने आकर बतलाया कि यह काफिला काबुल से आ रहा है और कंधार जा रहा है। उसमें पांच सौ घोड़े और बीस ऊंट भी हैं। मैंने अच्छी तरह पता लगा लिया है कि वे सब सौदागर हैं और घोड़े बेचने जा रहे हैं। आप खरीदना चाहें, तो कम कीमत पर घोड़े मिल सकते हैं। मैंने पचास ऐसे घोड़ों को छांट भी लिया है, जो नौजवान हैं और बड़ी ही उत्तम नस्ल के हैं।
यह सुनकर बादशाह ने तुरंत ही पचास घोड़े खरीद लिए, क्योंकि उसे कम दामों पर अच्छे घोड़े मिल गए। काफिले के बारे में उनकी चिंता भी जाती रही और उन परदेशी सौदागरों पर बादशाह की गुण-ग्राहकता का बड़ा अनुकूल प्रभाव भी पड़ा। बादशाह ने नौकर से कहा-देखा, तुम्हें पांच सिक्के और मीर मुंशी को पांच सौ दिरहम क्यों मिलते हैं?