हर बाधा पर विजय का दिव्य व्रत
विजया नाम ही इस एकादशी के प्रभाव को प्रकट करता है। यह व्रत साधक को आंतरिक और बाह्य दोनों प्रकार की चुनौतियों पर विजय दिलाने वाला है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक उपवास करने से शत्रु बाधाएं शांत होती हैं, अशुभता का नाश होता है और शुभ फलों में वृद्धि होती है। जो व्यक्ति जीवन में संघर्षों से घिरा हो, उसे इस एकादशी का व्रत विशेष रूप से करना चाहिए। पद्म पुराण में भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को इसकी महिमा बताते हुए कहा है कि इस व्रत को करने से वाजपेय यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है और साधक को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता मिलती है।
श्रीहरि की उपासना से प्राप्त होता है अक्षय पुण्य
शास्त्रों में वर्णित है कि विजया एकादशी का व्रत स्वर्णदान, भूमिदान, अन्नदान और गोदान से भी अधिक पुण्य प्रदान करने वाला है। इस दिन भगवान श्री नारायण की विधिपूर्वक पूजा का विधान है। पूजा के लिए एक वेदी बनाकर उस पर सप्त धान्य स्थापित किए जाते हैं। उसके ऊपर जल से भरा कलश रखकर आम या अशोक के पत्तों से सजाया जाता है। तत्पश्चात भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र स्थापित कर पीले पुष्प, ऋतुफल और तुलसी दल अर्पित किए जाते हैं। धूप-दीप से आरती उतारकर घी का अखंड दीप प्रज्वलित करना अत्यंत शुभ माना गया है। दीपदान से व्रत की सिद्धि मानी जाती है। इस दिन परनिंदा, छल-कपट, लोभ और द्वेष का त्याग कर पूर्ण भक्ति भाव से श्रीहरि का ध्यान करना चाहिए।
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जब विजया एकादशी से श्रीराम को मिली लंका विजय
त्रेतायुग में जब रावण माता सीता का हरण कर लंका ले गया, तब श्रीराम समुद्र तट पर अपनी सेना सहित खड़े होकर चिंतित हुए कि अगाध समुद्र को कैसे पार किया जाए। लक्ष्मणजी के सुझाव पर वे बकदालभ्य मुनि के आश्रम पहुंचे। मुनि ने बताया कि फाल्गुन कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी का व्रत करने से निश्चित रूप से विजय प्राप्त होगी। श्रीराम ने विधिपूर्वक इस व्रत का पालन किया। उसके प्रभाव से उन्होंने समुद्र पार किया, रावण सहित अनेक राक्षसों का संहार किया और अंततः लंका पर विजय प्राप्त कर माता सीता को पुनः प्राप्त किया। इस कथा से स्पष्ट होता है कि यह व्रत असंभव प्रतीत होने वाले कार्यों को भी संभव बना देता है।
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व्रत की सफलता का मूल मंत्र
विजया एकादशी केवल उपवास भर नहीं, बल्कि मन और व्यवहार की शुद्धि का भी पर्व है। इस दिन साधक को अपने विचारों को निर्मल रखना चाहिए। क्रोध, अहंकार और नकारात्मक भावनाओं से दूर रहकर श्री विष्णु के नाम का जप करना अत्यंत फलदायी होता है।
‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जप करने से मानसिक शांति और आत्मबल की प्राप्ति होती है। व्रत का वास्तविक फल तभी मिलता है जब आचरण भी सात्विक और संयमित हो। इस प्रकार विजया एकादशी का व्रत साधक के जीवन में आध्यात्मिक शक्ति, आत्मविश्वास और विजय का संचार करता है। श्रद्धा, नियम और भक्ति के साथ किया गया यह व्रत निश्चित रूप से जीवन की हर बाधा को पार कराने में सहायक सिद्ध होता है।