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Thaipusam 2022: आज है थाईपूसम का त्योहार, जानें तिथि, मुहूर्त एवं धार्मिक महत्व

Tue, 18 Jan 2022 01:03 PM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमरउजाला, नई दिल्ली

सार

Thaipusam 2022: थाईपूसम त्योहार दो शब्दों से मिलकर बना है। पहला थाई, जो तमिल माह है और दूसरा पुष्य नक्षत्र है,  जिसे तमिल में पूसम कहा जाता है। इन दोनों के योग से थाईपूसम बना है। 
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Thaipusam 2022 - फोटो : istock
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विस्तार
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थाईपूसम का पर्व दक्षिण भारत में में मनाये जाने वाले प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह त्योहार मुख्य रूप से तमिलनाडु तथा केरल में मनाया जाता है। इसके साथ ही अमेरिका, श्रीलंका, अफ्रीका, थाइलैंड जैसे अन्य देशों में भी तमिल समुदाय द्वारा काफी उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन भगवान शिव के बड़े पुत्र भगवान मुरुगन (कार्तिकेय) की पूजा की जाती है। थाईपूसम का त्योहार तमिल सौर माह थाई में पड़ता है, जबकि अन्य हिन्दू कैलेंडर में थाई माह को मकर माह के रूप में जानते हैं। थाईपूसम त्योहार दो शब्दों से मिलकर बना है। पहला थाई, जो तमिल माह है और दूसरा पुष्य नक्षत्र है,  जिसे तमिल में पूसम कहा जाता है। इन दोनों के योग से थाईपूसम बना है।  आइए जानते हैं थाईपूसम की तिथि, मुहूर्त, महत्व और पौराणिक कथाओं के बारे में। 

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Thaipusam 2022 - फोटो : istock
थाईपूसम 2022 तिथि एवं मुहूर्त
पूसम नक्षत्र का आरंभ:  18 जनवरी,मंगलवार , प्रात: 04: 37 मिनट से 
पूसम नक्षत्र समाप्त:   19 जनवरी, बुधवार, प्रात: 06: 42 मिनट तक 
शुभ मुहूर्त:  18 जनवरी, मंगलवार दोपहर 12: 10 मिनट से दोपहर 12:53 मिनट तक
सर्वार्थ सिद्धि योग: 19 जनवरी, बुधवार, 06: 43 मिनट से 07:14 मिनट तक 

Thaipusam 2022 - फोटो : istock
थाईपूसम का महत्व
थाईपूसम का यह त्योहार काफी महत्वपूर्ण है। यह ईश्वर के प्रति मानव की श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है। भगवान मुरुगन के प्रति समर्पित यह त्योहार हमारे जीवन में नयी खुशहाली लाने का कार्य करता है। इन दिन को बुराई पर अच्छे के जीत के रुप में भी देखा जाता है।
 

Thaipusam 2022 - फोटो : istock
थाईपूसम से जुड़ी पौराणिक कथाएं  
थाईपूसम का यह पर्व  पौराणिक कथाओं को याद दिलाता है। ऐसी मान्यता है कि इसी दिन भगवान कार्तिकेय ने  ताड़कासुर और उसकी सेना का वध किया था। यहीं कारण है कि इस दिन को बुराई पर अच्छाई के जीत के रुप में देखा जाता है तथा इस दिन थाईपूसम का यह विशेष त्योहार मनाया जाता है। थाईपूसम का यह त्योहार हमें बताता है कि हमारे जीवन में भक्ति और श्रद्धा का मतलब क्या होता है। जो हमारे जीवन में बड़े से बड़े संकट को दूर करने का कार्य करती है।

Thaipusam 2022 - फोटो : istock
कावड़ी अत्तम की कथा
थाईपुसम में कावड़ी अत्तम के परम्परा का एक पौराणिक महत्व भी है। एक बार भगवान शिव ने अगस्त्य ऋषि को दक्षिण भारत में दो पर्वत स्थापित करने का आदेश दिया। भगवान शिव के आज्ञा के अनुसार उन्होंने शक्तिगिरी पर्वत और शिवगिरी पर्वत दोनो को एक जंगल में स्थापित कर दिया, इसके बाद का कार्य उन्होंने अपने शिष्य इदुम्बन को दे दिया। जब इदुम्बन ने पर्वतों को हटाने के प्रयास किया तो, वह उन्हें उनके स्थान से हिला नही पाया। जिसके बाद उसने ईश्वर से सहायता मांगी और पर्वतों को ले जाने लगा काफी दूर तक चलने के बाद विश्राम करने के लिए वह दक्षिण भारत के पलानी नामक स्थान पर विश्राम करने के लिए रुका। विश्राम के पश्चात जब उसने पर्वतों को फिर से उठाना चाहा तो वह उन्हें फिर नही उठा पाया।
इसके पश्चात इदुम्बन ने वहां एक युवक को देखा और उससे पर्वतों को उठाने में मदद करने के लिए कहा, लेकिन जब उस युवक ने इनकार किया तो इदुम्बन और उस युवक में युद्ध छिड़ गया। थोड़ी ही देर में इदुम्बन को एहसास हुआ कि वह भगवान शिव के पुत्र भगवान कार्तिकेय हैं। जो अपने छोटे भाई गणेश से एक प्रतियोगिता में पराजित होने के बाद कैलाश पर्वत छोड़कर जंगलों में रहने लगे थे।
इस भीषण युद्ध में इदुम्बन की मृत्यु हो जाती है, लेकिन इसके पश्चात भगवान शिव उन्हें पुनः जीवित कर देते हैं।  ऐसी मान्यता है कि इसके बाद इदुम्बन ने कहा था कि जो व्यक्ति भी इन पर्वतों पर बने मंदिर में कावड़ी लेकर जायेगा, उसकी इच्छा अवश्य पूरी होगी। इसी के बाद से कावड़ी लेकर जाने की यह प्रथा प्रचलित हुई और जो व्यक्ति तमिलनाडु के पिलानी स्थित भगवान मुरुगन के मंदिर में कावड़ लेके जाता है, वह मंदिर में जाने से पहले इदुम्बन की समाधि पर जरुर जाता है।
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Thaipusam 2022 - फोटो : istock
थाईपुसम मनाने की प्राचीन परम्परा
थाईपुसम का यह विशेष त्योहार थाई महीने के पूर्णिमा से शुरु होकर अगले दस दिनों तक चलता है। इस दौरान हजारों भक्त मुरुगन भगवान की पूजा करने के लिए मंदिरों में इकठ्ठा होते हैं। इस दौरान भारी संख्या में भक्त विशेष तरीकों से पूजा करने के लिए मंदिर में जाते हैं। इनमें से काफी भक्त ‘छत्रिस’ (एक विशेष कावड़) अपने कंधों पर लेकर मंदिरों की ओर जाते हैं।
इस दौरान वह नृत्य करते हुए ‘वेल वेल शक्ति वेल’ का जाप करते हुए आगे बड़ते हैं, यह जयकारा भगवान मुरुगन के भक्तों में एक नयी उर्जा का संचार और उनके मनोबल को बढ़ाने का कार्य करता है। भगवान मुरुगन के प्रति अपनी अटूट श्रद्धा को प्रकट करने के लिए कुछ भक्तों अपने जीभ में सुई से छेद करके दर्शन करने जाते हैं। इस दौरान भक्तों द्वारा मुख्यतः पीले रंग की पोशाक पहनी जाती है और भगवान मुरुगन  को पीले रंग के फूल चढ़ाये जाते हैं।
इस विशेष पूजा के लिए भक्त खुद को प्रार्थना और उपवास के माध्यम से खुद को तैयार करते हैं। त्योहार के दिन भक्त कावड़ लेकर दर्शन के लिए निकलते है। कुछ भक्त कावंड़ के रुप में मटके या दूध के बर्तन को ले जाते हैं वही कुछ भक्त भीषण कष्टों को सहते हुए अपने त्वचा, जीभ या गाल में छेद करके कावड़ के बोझ को ले जाते है। इसके माध्यम से वह मुर्गन भगवान के प्रति अपने अटूट श्रद्धा को प्रदर्शित करते हैं।
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