1. शिलाद मुनि की तपस्या और पुत्र प्राप्ति की कथा
शिलाद मुनि के ब्रह्मचारी हो जाने के कारण वंश समाप्त होता देख उनके पितरों को चिंता सताने लगी। मुनि योग और तप में व्यस्त रहने के कारण गृहस्थ आश्रम नहीं अपनाना चाहते थे, मगर अपने पितरों की चिंता भी उनसे नहीं देखी जा रही थी। शिलाद मुनि ने अपनी तपस्या से इंद्र देवता को प्रसन्न करके उनसे जन्म और मृत्यु से हीन पुत्र प्राप्ति का वरदान मांगा। लेकिन इंद्र ने ऋषि को बताया कि वह ऐसा वरदान देने में अक्षम हैं और उन्हें शिवजी की तपस्या करनी चाहिए, क्योंकि जन्म-मृत्यु से मुक्त होने का वरदान देने का अधिकार केवल शिवजी को है।
2. नंदी का जन्म और शिवभक्ति
भगवान शिव की महिमा से ऋषि शिलाद को पुत्र प्राप्त हुआ, जिसका नाम 'नंदी' रखा गया। भगवान शंकर ने मित्र और वरुण नाम के दो मुनि शिलाद के आश्रम में भेजे, जिन्होंने नंदी के अल्पायु होने की बात कही। नंदी को जब यह ज्ञात हुआ तो वह महादेव की आराधना से मृत्यु को जीतने के लिए वन में चला गया।
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3. नंदी को भगवान शिव द्वारा दिया गया वरदान
दिन-रात तपस्या करने के बाद नंदी को भगवान शिव ने दर्शन दिए। शिवजी ने नंदी से उसकी इच्छा पूछी, तो नंदी ने कहा कि मैं पूरी उम्र सिर्फ आपके साथ ही रहना चाहता हूं। शिवजी ने उसे गले लगा लिया और नंदी को बैल का चेहरा दिया तथा उसे अपने वाहन, अपना मित्र, और अपने गणों में सबसे उत्तम रूप में स्वीकार कर लिया। साथ ही नंदी को अमर होने का वरदान भी प्रदान किया। शिवजी ने यह भी कहा कि जब भी उनकी कोई प्रतिमा स्थापित की जाएगी, तो उसके सम्मुख नंदी का होना अनिवार्य होगा, वरना वह प्रतिमा अधूरी मानी जाएगी।
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4. नंदी के कान में कही गई मनोकामना होती है पूरी
नंदी के दर्शन मात्र से ही मन को असीम शांति प्राप्त होती है। मान्यता है कि शिवजी अधिकतर अपनी तपस्या में लीन रहते हैं। भगवान शिव की तपस्या में किसी प्रकार का विघ्न न पड़े, इसलिए नंदी चैतन्य अवस्था में रहते हैं। ऐसी मान्यता है कि अगर अपनी मनोकामना नंदी के कानों में कही जाए, तो वे भगवान शिव तक उसे जरूर पहुंचाते हैं। फिर वह नंदी की प्रार्थना बन जाती है, जिसे भगवान शिव अवश्य पूरी करते हैं। यह भी माना जाता है कि शिवजी ने नंदी को यह वरदान स्वयं दिया था कि जो भक्त निश्छल मन से तुम्हारे कान में अपनी मनोकामना कहेंगे, उसकी सभी इच्छाएं पूरी होंगी।