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Sakat Chauth 2025: संकष्टी चतुर्थी पर दान का महत्व और मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली पौराणिक कथा

Wed, 15 Jan 2025 02:24 PM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

संतानों को सभी कष्टों से मुक्ति दिलाने वाली संकष्टी गणेश चतुर्थी का व्रत माघ कृष्ण पक्ष चतुर्थी को मनाया जाता है। इसे संकष्टी चतुर्थी, तिलकुटा चौथ या माघी चौथ भी कहते हैं।
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Sakat Chauth Vrat Katha - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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Sakat Chauth 2025: चतुर्थी तिथि के देवता के रूप में सुखकर्ता श्रीगणेश सर्वत्र पूजे जाते हैं। संतानों को सभी कष्टों से मुक्ति दिलाने वाली संकष्टी गणेश चतुर्थी का व्रत माघ कृष्ण पक्ष चतुर्थी को मनाया जाता है। इसे संकष्टी चतुर्थी, तिलकुटा चौथ या माघी चौथ भी कहते हैं। इस दिन तिल का दान और सेवन करने का विशेष महत्व है। धार्मिक ग्रंथों और शास्त्रों के अनुसार इस व्रत और दान से कष्टों का निवारण होता है। सुख-समृद्धि बढ़ती है और भगवान गणेश का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

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संकष्टी चतुर्थी पर दान का महत्व
तिल चौथ के दिन तिल से बने व्यंजन भगवान गणेश को अर्पित किए जाते हैं और बाद में इनका दान किया जाता है। शास्त्रों में कहा गया है।

"तिलं ददाति यः भक्त्या सर्वपापैः प्रमुच्यते।"
अर्थात, जो व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति से तिल का दान करता है, वह अपने सभी पापों से मुक्त हो जाता है। स्कंद पुराण के अनुसार तिल का दान करने से व्यक्ति के सभी जाने-अनजाने पापों का नाश होता है और पितृदोष से मुक्ति मिलती है। मत्स्य पुराण के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु के पसीने से उत्पन्न तिल और माता लक्ष्मी के द्वारा प्रकट किए गन्ने के रस से बने गुड़ का तिलकुटा बनाकर उसे दान करना चाहिए। व्रत करने वालों के लिए यदि संभव हो तो दस महादान जिनमें अन्नदान, नमक का दान, गुड का दान, स्वर्ण दान, तिल का दान, वस्त्र का दान, गौघृत का दान, रत्नों का दान, चांदी का दान और दसवां शक्कर का दान करें। ऐसा करके प्राणी दुःख-दरिद्र, कर्ज, रोग और अपमान के विष से मुक्ति पा सकता है। इस दिन गाय और हाथी को गुड़ खिलाने से अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है।  

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ऐसा कहते है शास्त्र
पुराणों के अनुसार एक बार शिवजी ने कार्तिकेय और गणेश जी से पूछा कि तुममें से कौन देवताओं के कष्टों का निवारण कर सकता है। तब कार्तिकेय और गणेशजी दोनों ने ही स्वयं को इस कार्य के लिए सक्षम बताया। इस पर भगवान शिव ने कहा कि तुम दोनों में से जो भी सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके आएगा वही देवताओं की मदद करने जाएगा। ये वचन सुनते ही कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल गए। परन्तु गणेश जी विचारमग्न हो गए कि वे चूहे के ऊपर चढ़कर सारी पृथ्वी की परिक्रमा करेंगे तो इस कार्य में उन्हें बहुत समय लग जाएगा। तभी उन्हें एक उपाय सूझा। वे अपने स्थान से उठे और अपने माता-पिता की सात परिक्रमा करके वापस बैठ गए। 
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परिक्रमा करके लौटने पर कार्तिकेय स्वयं को विजयी बताया। शिवजी ने गणेशजी से पृथ्वी की परिक्रमा न करने का कारण पूछा। तब गणेश जी ने कहा -'माता-पिता के चरणों में ही समस्त लोक हैं '। यह सुनकर भगवान शिव ने गणेशजी को देवताओं के संकट दूर करने की आज्ञा दी और गणेश जी को आशीर्वाद दिया कि चतुर्थी के दिन जो तुम्हारा श्रद्धा पूर्वक पूजन करेगा और रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देगा उसके तीनों ताप यानी दैहिक ताप ,दैविक ताप तथा भौतिक ताप दूर हो जाएंगे।



 
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