Ratha Saptami: रथसप्तमी एक ऐसा त्योहार है जो सूचित करता है कि सूर्य उत्तरायण में मार्गक्रमण कर रहा है।
सूर्य का उत्तरायण की ओर मार्गक्रम हो रहा है, यह दर्शाने वाला रथ सप्तमी का त्योहार
रथसप्तमी एक ऐसा त्योहार है जो सूचित करता है कि सूर्य उत्तरायण में मार्गक्रमण कर रहा है। उत्तरायण अर्थात उत्तर दिशा से मार्गक्रमण करना। उत्तरायण यानी सूर्य उत्तर दिशा की ओर झुका होता है। 'श्री सूर्यनारायण अपने रथ को उत्तरी गोलार्ध में घुमा रहे हैं', इस स्थिति मे रथसप्तमी को दर्शाया गया है। रथसप्तमी किसानों के लिए फसल का दिन और दक्षिण भारत में धीरे-धीरे बढ़ते तापमान का दर्शक है एवं वसंत ऋतु नजदीक आने का प्रतीक भी है।
जीवन का मूल स्रोत है सूर्य
सूर्य जीवन का मूल स्रोत है। सूर्य की किरणें, विटामिन 'डी' जीवनसत्व प्रदान करती हैं, जो शरीर के लिए आवश्यक है। समय का मापन सूर्य पर निर्भर होता है। सूर्य ग्रहों का राजा है और इसका स्थान नवग्रहों में है। यह स्थिर है और अन्य सभी ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं। सूर्य स्वयं प्रकाशमान है और अन्य ग्रह उसका प्रकाश प्राप्त करते हैं।
Ratha Saptami: सूर्य देव के रथ में सात घोड़े सप्ताह की सात दिनों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
हिंदू धर्म में सूर्य पूजा का महत्व
हिंदू धर्म में सूर्य पूजा का बहुत महत्व है। प्रतिदिन प्रातः काल सूर्य को अर्घ्य देने से, अंधकार का नाश कर जगत को प्रकाशमान करने की शक्ति सूर्य को प्राप्त होती है। (जिस प्रकार उपासना के कारण मूर्ति जागृत होती है यह उसी प्रकार है)
ज्योतिष शास्त्र अनुसार रवि का (अर्थात सूर्य का) महत्व
ज्योतिष शास्त्र अनुसार रवि (अर्थात् सूर्य) आत्मकारक है। मानव शरीर का जीवन, आध्यात्मिक शक्ति और चैतन्य शक्ति इनका बोध रवि के माध्यम से होता है', यह उसका अर्थ है। किसी की जन्मकुंडली में सूर्य जितना बलवान होगा, उसकी जीवन शक्ती और प्रतिरोधक क्षमता उतनी ही बेहतर होगी। राजा, मुखिया, सत्ता, अधिकार, कठोरता, तत्वनिष्ठ, कर्तृत्व, सन्मान, प्रसिद्धि, स्वास्थ्य, वैद्यकशास्त्र आदि का कारक रवि है। सूर्य देव के रथ में सात घोड़े सप्ताह की सात दिनों का प्रतिनिधित्व करते हैं। रथ के बारह पहिये बारह राशियों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
Ratha Saptami: सूर्यदेव से प्रार्थना करें और भक्ति के साथ आदित्य हृदयस्तोत्रम, सूर्याष्टकम् और सूर्य कवचम् में से किसी एक स्त्रोत्र का पाठ करें या सुनें।
रथसप्तमी पर किये जाने वाले सूर्यदेव की पूजा विधि
रथ सप्तमी के दिन सूर्योदय के समय स्नान करना चाहिये। सूर्य देव के 12 नाम ले कर कम से कम 12 सूर्य नमस्कार करें । पीढ़े पर, रथ पर विराजमान सूर्यनारायण की आकृति बनाकर उनकी पूजा करें। उन्हे लाल फूल अर्पित करे। सूर्यदेव से प्रार्थना करें और भक्ति के साथ आदित्य हृदयस्तोत्रम, सूर्याष्टकम् और सूर्य कवचम् में से किसी एक स्त्रोत्र का पाठ करें या सुनें। रथसप्तमी के दिन कोई नशा न करे। रथसप्तमी के दूसरे दिन से प्रतिदिन सूर्य को प्रार्थना करनी चाहिए और सूर्य नमस्कार करना चाहिए। इससे स्वास्थ्य अच्छा रहता है।'
रथसप्तमी मनाने की विधि
सूर्यनारायण की पूजा : सूर्यनारायण के सात घोड़ों का रथ, अरुण सारथी और सूर्यनारायण को रंगोली या चंदन से पीढ़े पर बनाया जाता है और सूर्यनारायण की पूजा की जाती है । आंगन में, गाय के गोबर के उपलों को जलाकर उस पर एक कटोरे में तब तक दूध गर्म किया जाता है जब तक कि दूध बरतन से गिर नही जाता है; अर्थात अग्नि को समर्पण होने तक रखते है। फिर बचा हुआ दूध सभी को प्रसाद के रूप में दिया जाता है।
मकर संक्रांति से रथसप्तमी के काल में की जाने वाली पारिवारिक विधियां : ‘बहु का तिलवण अर्थात तिल और शक्कर की चिरौंजी से बने अलंकार बहू को पहनाकर हल्दी कुमकुम किया जाता है। दामाद को विवाह के उपरांत प्रथम संक्रांति पर उपायन देते हैं और एक वर्ष की आयु के बालक का बोरवण अर्थात बालक को भी तिल और शक्कर की चिरौंजी से बने अलंकार पहनाकर अन्य बच्चों को बुलाया जाता है तथा दामाद को भी अलंकार पहनाए जाते हैं।