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Ram Navami 2019 : जानें किन गुणों के कारण भगवान राम कहलाए 'मर्यादा पुरुषोत्तम'

Sat, 13 Apr 2019 12:12 PM IST
Madhukar Mishra पद्मश्री डा. रवींद्र नागर
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Ram Navami 2019
श्री राम नवमी हिंदू धर्म के परम पावन पर्वों में से एक है। इसकी गणना प्रमुख चार जयंतियों में है। यह चैत्र शुकल नवमी को मनाई जाती है। इसी दिन मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम धराधाम पर अवतीर्ण हुए थे। अब से लगभग 9 लाख वर्ष पहले भगवान ने दुष्टों का दमन कर सच्चे धर्म की स्थापना के लिए उन्होंने मानव शरीर धारण किया था। 

चैत्रे मासि नवम्यां तु शुक्ल पक्षे रघूत्तम:। 
प्रादुरासीत् पुरा ब्रह्नान् पर ब्रह्मैव केवलम्।। 


उस समय गुरु दिन, पुष्य नक्षत्र और कर्क लग्न था। कुछ लोग पुनर्वसु नक्षत्र भी बताते हैं। ऐसी नवमी कभी-कभी पड़ती है। उस समय अद्भुत योग था। पांच ग्रह उच्च के थे। बसंत ऋतु, न अति शीत न अति गर्म, दोपहर का उज्जवल प्रकाश, सुरभित वातावरण सब कुछ असाधारण। 
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Ram Navami 2019
इन गुणों ने बनाया मर्यादा पुरुषोत्तम

भगवान ने अपने आदर्श चरित्र से मानवता को अमर बना दिया। उससे पूर्व सुर और असुर का ही नाम अधिक लिया जाता था। मानव का महत्व अब तक अज्ञात था। श्री राम जी ने अपने अलौकिक स्वभाव, अद्भुत कार्य, उत्तम शील, अद्वितीय वीरता, अनुकरणीय सहनशीलता, विनम्रता, धर्म-प्रियता, परोपकार, स्वार्थ-त्याग आदि से जन-जन के मानस में अपना अधिकार जमा लिया था। यही कारण है कि अपने जीवनकाल में ही वे परम पूज्य हो गये थे और उसके बाद उत्तरोत्तर उनके प्रति श्रद्धा भक्ति भावना में विकास होता गया। 
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Ram Navami 2019
विदेशों में भी है राम नाम की धूम

उनके चरित्र का गुणगान केवल भारत अथवा निकटस्थ देशों में ही सीमित नहीं है। विश्व के अनेक सुदूर देशों में भी उनकी जीवन कथाएं दोहराई जाती हैं। सुमात्रा, जावा, कोरिया, मलेशिया आदि अनेक देशों में अति प्राचीन काल से राम कथा प्रचलित है। कई देशों में अहिंदू लोग भी रामलीला करते हैं। 

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Ram Navami 2019
सिर्फ दुष्टों का किया अंत, नहीं उठाया कोई लाभ

धर्म की रक्षा और दुष्टों के का दमन आवश्यक है, इसलिए आततायियों का विनाश किया किंतु उनसे कोई निजी लाभ नहीं उठाया। उनका राज्य उनके भाईयों को सौंप दिया। केवल वहां की प्रजा की पीड़ा का अंत किया। 
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Ram Navami 2019
न्याय की लड़ाई में मिला पशु-पक्षियों का भी साथ 
असत्य और अन्याय पर सत्य और न्याय की विजय के सिद्धांत की स्थापना की। इसमें उन्हें पशु-पक्षियों तक से भी सहयोग मिला। संस्कृत के सुप्रसिद्ध कवि मुरारी ने कहा है कि रामायण और राम चरित्र का तथ्य ही यह है कि न्यायी की सहायता पशु-पक्षी भी करते हैं और कुमार्ग में चलने वाले अन्यायी का साथ उनके सगे भाई भी छोड़ जाते हैं। 
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Ram Navami 2019
इसलिए धारण किया मानव का रूप

श्री राम परंमब्रह्म के साक्षात् अवतार थे। उनमें अपारा शक्ति थी। वे क्षण भर में सारे ब्रह्मांड का विनाश कर सकते थे। रावण को बैठे-बैठे भस्मसात् कर सकते थे। 

'भृकुटि विलास सृष्टि लय होई।'

किंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। मानव रूप धारण कर लिया था अतएव मानव लीला की। वे गुरु पढ़ने भी गये। गोस्वामी ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया है -

'जाके सहज स्वास श्रृतिचारी, सो हरि पढ़ यह अचरज भारी।।'

उनकी भावना थी कि आगे चलकर लोग इन आचरणों का अनुकरण करेंगे। गीता में भी महापुरुषों के संबंध में कहा गया है — 'स यत्प्रमाणं करते लोकस्तदनुवर्तते।' अर्थात्, श्रेष्ठ लोग जो बात प्रमाणित करते हैं अन्य लोग भी उनका अनुसरण करते हैं। 
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Ram Navami 2019
राम राज्य की महिमा

राम जी ने केवल जनता ही के लिए आदर्श उपस्थित नहीं किया। उन्होंने राजाओं का भी मार्गदर्शन भी किया। वे अच्छी तरह जानते थे कि सीता जी निर्दोष हैं। उनके सतीत्व में कभी आंच नहीं आई है, किंतु एक सामान्य धोबी की घरेलू बातचीत को आधार मानकर वह भी अपने अनुचर द्वारा ज्ञात होने पर, उन्होंने बिना किसी संकोच के अपनी अर्धांगिनी को पुन: वनवास देकर प्रजा की अति तुच्छ भावना का भी समुचित समादर किया। उन्होंने राजाओं को शिक्षा दी कि प्रजा की छोटी से छोटी आवाज का भी ध्यान रखा जाए। उनके मत का आदर किया जाए, उसके लिए कुछ भी कीमत चुकानी पड़े। 

इस प्रकार रामजी की कथा न केवल साधु-संन्यासियों के लिए बल्कि गृहस्थों और राजनीतिज्ञों के लिए भी संजीवनी के समान है। बार-बार उसके श्रवण-मनन से भी तृप्ति नहीं होती है। वह नित्य नूतन बनी रहती है। 

तुलसीदास का कथन है कि — 

' राम चरित ते सुनत अघाहीं, रस विशेष पावा तिन नाहीं।'
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rama and hanuman
संसार-सागर में बहती हुई नाव के लिए भगवान का पुण्य चरित प्रकाश स्तंभ के समान है। उनकी जन्मतिथि राम नवमी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक पर्व है। हिंदू संस्कृति के परम उज्जवल आदर्शों का स्मरण दिलाता हुआ यह पर्व आज भी मानव समाज के सामने सुख एवं शांति का सच्चा मार्ग प्रस्तुत करने में समर्थ है।

संसार के अमूल्य ग्रंथ रामायण की रचना भी संत तुलसीदास ने इसी दिन प्रारंभ की थी जो आज कोटि-कोटि मानवों का कंठहार बनी हुई है, जो विपत्ति में भी अपनी संस्कृति रक्षा का संबल है और जिसने अनेक व्यक्तियों को पथ-भ्रष्ट होने से बचाया है। साधारण से साधारण अर्धशिक्षित या शिक्षित जन भी रामायण की चौपाइयां गुनगुनाता रहता है और उत्साह का प्रकाश प्राप्त करता है। साथ ही विद्वान व्यक्ति भी दर्शन-शास्त्र की अनेक ग्रंथियां सहज ही सुलझाता रहता है। 

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