संभव हो तो देवी लक्ष्मी को कमल का पुष्प अर्पित करें। इसके बाद मखाने की खीर,आटे की पंजीरी या शुद्ध घी से बने मिष्ठान्न का भोग लगाएं। आरती के बाद लक्ष्मीनारायण व्रत की कथा श्रवण या वाचन करें। पूर्णिमा तिथि पर व्रत रखकर विधिवत विष्णु जी का पूजन करने और चंद्रमा को अर्घ्य देने से आपके घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। यह तिथि मां लक्ष्मी को भी अत्यंत प्रिय होती है, इसलिए इस दिन श्री हरि के साथ लक्ष्मी पूजन करने से दरिद्रता का नाश होता है।धार्मिक मान्यता है कि व्रत के प्रभाव से मनुष्य की समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। इस व्रत को करने से धन, संपत्ति, सुख, वैभव में वृद्धि होती है। इस व्रत को गृहस्थ ही नहीं,अविवाहितों को भी करना चाहिए, इससे उन्हें सुयोग्य जीवन साथी की प्राप्ति होती है।
इस दिन वट वृक्ष से सौभाग्य की कामना
ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन स्त्रियां उपवास रखकर बरगद वृक्ष के नीचे बैठ कर पूजा आराधना करती हैं। पूजा के समय महिलाओं को शुद्ध जल और कच्चा दूध से वट वृक्ष को सींच कर वृक्ष के तने में कच्चा सूत या लाल मौली लपेटकर कम से कम सात प्रदिक्षणा करनी चाहिए। एक बांस की टोकरी मे सात तरह के अनाज रखें व दूसरी टोकरी में सावित्री की प्रतिमा रख कर जल, अक्षत, कुमकुम से उनकी पूजा करें।तदन्तर परम पतिव्रता सावित्री देवी से इस प्रकार प्रार्थना करें-
जगतपूज्ये जगन्मातः सावित्रि पतिदैवते
पत्या सहवियोगं मे वतस्थे कुरु ते नमः॥
अर्थात 'जगन्माता सावित्रि ! तुम संपूर्ण जगत के लिए पूजनीय तथा पति को ही इष्टदेव मानने वाली पतिव्रता हो। वट वृक्ष पर निवास करने वाली देवी! तुम ऐसी कृपा करो,जिससे मेरा अपने पति के साथ नित्य संयोग बना रहे। कभी वियोग न हो। तुम्हें मेरा सादर नमस्कार है। जो नारी प्रार्थना करके दूसरे दिन सुवासिनी स्त्रियों को भोजन कराने के पश्चात स्वयं भोजन करती है और अपनी क्षमता के अनुसार दान दक्षिणा देते हुए अपने पति की लंबी आयु की कामना करती हैं वह सदा सौभाग्यवती बनी रहती है,ऐसी शास्त्रों में मान्यता है।