फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Jyeshtha Purnima 2021: जानिए क्यों इतनी खास है ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा

Tue, 22 Jun 2021 05:15 PM IST
विनोद शुक्ला अनीता जैन, वास्तुविद

सार

पूर्णिमा पर लक्ष्मी-नारायण व्रत करने का बहुत महत्व है। भगवान विष्णु की पूजा करने से सभी सांसारिक दुखों का नाश होता है और सुखों की प्राप्ति होती है।
विज्ञापन
ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन वट पूर्णिमा व्रत एवं संत कबीर दास जयंती का पर्व भी मनाया जाता है।
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

इस वर्ष 24 जून को ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा मनाई जाएगी। यह दिन भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी  की पूजा-अर्चना के लिए समर्पित है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने, व्रत एवं दान-पुण्य करने से पुण्य फलों की प्राप्ति होती है। इस बार पूर्णिमा,गुरूवार को पड़ने के कारण इसका और भी महत्व बढ़ जाता है, इस दिन भगवान विष्णु की आराधना विशेष फलदायी है। पूर्णिमा के दिन चंद्रदेव अपनी पूर्ण कला से युक्त होते हैं , जिसका प्रभाव सीधे व्यक्ति के मन और शरीर पर पड़ता है। इस दिन चंद्र पूजन से व्यक्ति की मानसिक और आर्थिक स्थिति ठीक होती है क्योंकि ज्योतिष में चंद्रमा को द्रव्य और मन का कारक कहा गया है। इस दिन वट पूर्णिमा व्रत एवं संत कबीर दास जयंती का पर्व भी मनाया जाता है।

विज्ञापन

पूर्णिमा को लक्ष्मी-नारायण व्रत
पूर्णिमा पर लक्ष्मी-नारायण व्रत करने का बहुत महत्व है। भगवान विष्णु की पूजा करने से सभी सांसारिक दुखों का नाश होता है और सुखों की प्राप्ति होती है। इस दिन सूर्योदय से पूर्व स्नान कर उगते सूर्य को जल दें और इसके बाद भगवान लक्ष्मीनारायण के सामने हाथ में अक्षत, जल, पूजा की सुपारी और जल लेकर व्रत का संकल्प लें। पूजा के लिए पूर्व ओर मुख कर बैठ जाएं और एक चौकी पर लाल और पीला वस्त्र बिछा कर लक्ष्मी-नारायण को आसन दें। पीला कपड़ा दाहिनी ओर बिछा कर विष्णु जी को स्थापित करें और लाल कपड़ा बाएं ओर बिछा का देवी लक्ष्मी को विराजित करें। इसके बाद लाल, सफेद और पीले पुष्प अर्पित करते हुए विधि-विधान से पूजन करें। 

संभव हो तो देवी लक्ष्मी को कमल का पुष्प अर्पित करें। इसके बाद मखाने की खीर,आटे की पंजीरी या शुद्ध घी से बने मिष्ठान्न का भोग लगाएं। आरती के बाद लक्ष्मीनारायण व्रत की कथा श्रवण या वाचन करें। पूर्णिमा तिथि पर व्रत रखकर विधिवत विष्णु जी का पूजन करने और चंद्रमा को अर्घ्य देने से आपके घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। यह तिथि मां लक्ष्मी को भी अत्यंत प्रिय होती है, इसलिए इस दिन श्री हरि के साथ लक्ष्मी पूजन करने से दरिद्रता का नाश होता है।धार्मिक मान्यता है कि व्रत के प्रभाव से मनुष्य की समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। इस व्रत को करने से धन, संपत्ति, सुख, वैभव में वृद्धि होती है। इस व्रत को गृहस्थ ही नहीं,अविवाहितों को भी करना चाहिए, इससे उन्हें सुयोग्य जीवन साथी की प्राप्ति होती है।

इस दिन वट वृक्ष से सौभाग्य की कामना
ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन स्त्रियां उपवास रखकर बरगद वृक्ष के नीचे बैठ कर पूजा आराधना करती हैं। पूजा के समय महिलाओं को शुद्ध जल और कच्चा दूध से वट वृक्ष को सींच कर वृक्ष के तने में कच्चा सूत या लाल मौली लपेटकर कम से कम सात प्रदिक्षणा करनी चाहिए। एक बांस की टोकरी मे सात तरह के अनाज रखें व दूसरी टोकरी में सावित्री की प्रतिमा रख कर जल, अक्षत, कुमकुम से उनकी पूजा करें।तदन्तर परम पतिव्रता सावित्री देवी से इस प्रकार प्रार्थना करें-
जगतपूज्ये जगन्मातः सावित्रि पतिदैवते
पत्या सहवियोगं मे वतस्थे कुरु ते नमः॥

 अर्थात 'जगन्माता सावित्रि ! तुम संपूर्ण जगत के लिए पूजनीय तथा पति को ही इष्टदेव मानने वाली पतिव्रता हो। वट वृक्ष पर निवास करने वाली देवी! तुम ऐसी कृपा करो,जिससे मेरा अपने पति के साथ नित्य संयोग बना रहे। कभी वियोग न हो। तुम्हें मेरा सादर नमस्कार है। जो नारी प्रार्थना करके दूसरे दिन सुवासिनी स्त्रियों को भोजन कराने के पश्चात स्वयं भोजन करती है और अपनी क्षमता के अनुसार दान दक्षिणा देते हुए अपने पति की लंबी आयु की कामना करती हैं वह सदा सौभाग्यवती बनी रहती है,ऐसी शास्त्रों में मान्यता है। 
विज्ञापन

कबीरदास जयंती का पर्व
संत कबीर दास का जन्म ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन हुआ था इसलिए प्रतिवर्ष ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन उनकी जयंती मनाई जाती है। महान संत कबीर 15वीं सदी के भारतीय रहस्यवादी कवि और समाज सुधारक थे। वे हिन्दू धर्म या इस्लाम को न मानते हुए धर्मनिरपेक्ष मूल्यों और मानव सेवा के प्रति पूरी तरह समर्पित थे। संत कबीर ने अपने पूरे जीवन काल में पाखंड,अंधविश्वास आदि समाज में व्याप्त अनेकों  कुरीतियों का विरोध करते हुए अपनी अमृतवााणी से लोगों को एकता का पाठ पढ़ाया। कबीरदास भक्तिकाल के प्रमुख कवि थे, वे ज्ञानाश्रयी-निर्गुण शाखा की काव्यधारा के प्रवर्तक थे।  दोहे के रूप में उनकी रचनाएं आज भी गायी जाती हैं।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें