आज देश के प्रमुख और बड़े कृष्ण मंदिरों में जन्माष्टमी का पर्व मनाया जा रहा है। जिसमें मथुरा और द्वारिका के कृष्ण मंदिर प्रमुख है। भाद्रपद महीने के कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र की मध्यरात्रि में हुआ था। इस बार अष्टमी तिथि दो दिन होने के कारण 11 और 12 अगस्त को मनाई जा रही है। साल 2020 में भगवान कृष्ण का यह 5247 वां जन्मोत्सव है। इस दिन व्रत रखने वाले उनके भक्त पूरे दिन उनकी भक्ति में डूबे रहते हैं। आइए जानते हैं जन्माष्टमी पर सुबह से लेकर रात तक कैसे मनाया जाता है जन्माष्टमी की पर्व, क्या है पूजा विधि और पूजा सामग्री...
पूजन विधि
जन्माष्टमी के दिन सुबह जल्दी उठकर पूजा करनी चाहिए। अगर आपने अपने पूजा घर पर लड्डू गोपाल को रहा है तो उनको सुबह जल्दी भोग लगाना चाहिए। पूजा करने से पहले हाथ में गंगाजल,फूल और चावल को हाथों में रखकर व्रत रखने और रात को पूजा का संकल्प करना चाहिए। सुबह की पूजा में बाल गोपाल को रोज की तरह उन्हें स्नान और चंदन का टीका लगाने के बाद माखन और मिश्री का भोग लगाएं। भोग में तुलसी के पत्ते को जरूर शामिल करें।
जन्माष्टमी के पर्व पर भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल की पूजा करने का महत्व होता है। इस दिन बाल गोपाल की पूजा और उनका श्रृंगार बहुत अच्छी तरह से किया जाता है। भोग के लिए तरह पकवान और फल फूल आदि को रखा जाता है। भोग में घनिया की पंचीरी का विशेष महत्व होता है। बाल गोपाल के पूजा स्थल को रंग बिरंगे फल और फूलों से सजाया जाता है। मध्यरात्रि को कृष्ण जन्मोत्सव, आरती और भजन गाकर जन्माष्टमी मनाई जाती है।
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जन्म कथा
श्री कृष्ण परम पुरुषोत्तम भगवान का जन्म भाद्रपद की अष्ठमी तिथि (रोहिणी नक्षत्र और चन्द्रमा वृषभ राशि में ) को मध्यरात्रि में हुआ। उनके जन्म लेते ही दिशाएं स्वच्छ व प्रसन्न एवं समस्त पृथ्वी मंगलमय हो गई थी। विष्णु के अवतार श्री कृष्ण के प्रकट होते ही जेल की कोठरी में प्रकाश फैल गया।
वासुदेव-देवकी के सामने शंख, चक्र, गदा एवं पद्मधारी चतुर्भुज भगवान ने अपना रूप प्रकट कर कहा-अब मैं बालक का रूप धारण करता हूँ, तुम मुझे तत्काल गोकुल में नन्द के यहां पहुंचा दो और उनकी अभी-अभी जन्मी कन्या को लाकर कंस को सौंप दो। तभी वासुदेवजी की हथकड़ियां खुल गयीं, दरवाज़े अपने आप खुल गए व पहरेदार सो गए। वासुदेव श्री कृष्ण को सूप में रखकर गोकुल को चल दिए। रास्ते में यमुना श्री कृष्ण के चरणों को स्पर्श करने के लिए ऊपर बढ़ने लगीं।
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भगवान ने अपने श्री चरण लटका दिए और चरण छूने के बाद यमुनाजी घट गयीं। बालक कृष्ण को यशोदाजी के बगल में सुलाकर कन्या को वापस लेकर वासुदेव कंस के कारागार में वापस आ गए। कंस ने कारागार में आकर कन्या को लेकर पत्थर पर पटककर मारना चाहा परंतु वह कंस के हाथ से छूटकर आकाश में उड़ गई और देवी का रूप धारण कर बोली-हे कंस! मुझे मारने से क्या लाभ है? तेरा शत्रु तो गोकुल में पहुँच चुका है। यह देखकर कंस हतप्रद और व्याकुल हो गया। कृष्ण के प्राकट्य से स्वर्ग में देवताओं की दुन्दुभियाँ अपने आप बज उठीं तथा सिद्ध और चारण भगवान के मंगलमय गुणों की स्तुति करने लगे।