श्रावण मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को हरियाली अमावस्या के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व प्रकृति, पितरों और परमात्मा को समर्पित होता है। वर्षा ऋतु में जब धरती हरी चादर ओढ़ लेती है, तब यह पर्व हमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर देता है। इस वर्ष यह तिथि 24 जुलाई को है। नारद पुराण में वर्णित है कि इस दिन श्राद्ध, दान, होम, देवपूजन और वृक्षारोपण करने से अक्षय फल की प्राप्ति होती है।
शिव-पार्वती की पूजा से मिलता है सौभाग्य
हरियाली अमावस्या पर भगवान शिव और माता पार्वती की संयुक्त पूजा का विशेष महत्त्व है। कुंवारी कन्याएं इस दिन पूजन करके मनचाहा जीवनसाथी प्राप्त करती हैं, वहीं सुहागन स्त्रियों को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह दिन विशेष रूप से उन लोगों के लिए भी शुभ माना गया है जिनकी कुंडली में कालसर्प दोष, पितृदोष या शनि का प्रभाव है। वे रुद्राभिषेक या जलाभिषेक से ग्रह दोषों से मुक्ति पा सकते हैं।
दीपदान से मिलती है पितरों की कृपा
हरियाली अमावस्या के दिन पितरों को प्रसन्न करने के लिए दीपदान का विधान है। शाम के समय नदी के किनारे या किसी मंदिर में दीपक जलाना अत्यंत शुभ माना गया है। ऐसा करने से पितृदोष की शांति होती है और घर में सुख-शांति का वातावरण बनता है।
वृक्षारोपण से पूरी होती हैं मनोकामनाएं
शास्त्रों के अनुसार इस दिन वृक्षारोपण करने से हर इच्छा पूरी होती है। भविष्य पुराण में कहा गया है कि वृक्ष, विशेषकर पीपल, नीम, बेल, शमी, आंवला, अशोक, तुलसी आदि में देवी-देवताओं का वास होता है। पीपल ब्रह्मा, विष्णु और शिव का प्रतीक है और इसके दर्शन, स्पर्श और परिक्रमा से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा आती है। संतान सुख, आरोग्यता, सौभाग्य और बुद्धि के लिए भी यह वृक्षारोपण अत्यंत लाभकारी माना गया है।
विज्ञान भी करता है इस पर्व का समर्थन
हरियाली अमावस्या न केवल धार्मिक दृष्टि से, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। वृक्ष ऑक्सीजन प्रदान करके न केवल जीवों को जीवन देते हैं, बल्कि पर्यावरण को भी संतुलित और शुद्ध बनाए रखते हैं। पेड़-पौधों को देवस्वरूप मानकर उनकी पूजा करना वास्तव में पर्यावरण के संरक्षण की वैज्ञानिक योजना है, जो हमारी संस्कृति में हजारों वर्षों से चली आ रही है।
धरती को हरा-भरा बनाने का संकल्प
आज जब संपूर्ण विश्व पर्यावरण संकट से जूझ रहा है, तब हरियाली अमावस्या एक ऐसा पर्व है जो हमें प्रकृति के प्रति कर्तव्य की याद दिलाता है। यह दिन न केवल पूजा और परंपरा का प्रतीक है, बल्कि धरती को हरा-भरा करने का संकल्प लेने का भी श्रेष्ठ अवसर है। एक वृक्ष लगाना यह छोटा-सा प्रयास भी भविष्य को संवार सकता है।