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Gangaur Festival 2024: अखण्ड सौभाग्य की कामना का पर्व गणगौर आज, जानिए पूजाविधि और महत्व

Thu, 11 Apr 2024 10:34 AM IST
विनोद शुक्ला ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला

सार

गणगौर पूजा सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है,जो सामाजिक एकता, साझा, संवेदनशीलता और भाईचारे को बढ़ावा देती है। 
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Gangaur Vrat 2024: विवाह योग्य कन्याएं शिव जैसे भावी पति को पाने के लिए पूर्ण श्रद्धा भक्ति से यह पूजन करती हैं।
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विस्तार
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भारतीय सनातन सभ्यता में अखण्ड सुहाग का प्रतीक गणगौर के पूजन और व्रत का अपना एक अलग ही स्थान है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाने वाला यह त्योहार स्त्रियों के लिए अखण्ड सौभाग्य प्राप्ति का पर्व है। वास्तव में गणगौर पूजन मां पार्वती और भगवान शिव की पूजा का दिन है। चूंकि मां पार्वती ने भी अखण्ड सौभाग्य की कामना से कठोर तपस्या की थी और उसी तप के प्रताप से भगवान शिव को पाया। इस दिन भगवान शिव ने माता पार्वती को तथा पार्वती जी ने समस्त स्त्री जाति को सौभाग्य का वरदान दिया था। शास्त्रों के अनुसार तभी से इस व्रत को करने की प्रथा आरम्भ हुई।

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गणगौर पूजन का महत्व
विवाह योग्य कन्याएं शिव जैसे भावी पति को पाने के लिए पूर्ण श्रद्धा भक्ति से यह पूजन करती हैं। वहीं सुहागिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु, मंगल कामना और परिवार के साथ सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। यह त्योहार महिलाओं के साधारण दैनिक जीवन को एक अलग रंग और जीवंतता देता है। इसके अलावा गणगौर पूजा सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है,जो सामाजिक एकता, साझा, संवेदनशीलता और भाईचारे को बढ़ावा देती है। 

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ऐसे करें गणगौर पूजन
गणगौर पूजन के लिए कुंवारी कन्याएं व विवाहित स्त्रियां सुबह सुंदर वस्त्र एवं आभूषण पहन कर सिर पर लोटा लेकर बाग़-बगीचों में जाती हैं। वहीं से ताज़ा जल लोटों में भरकर उसमें हरी दूब और फूल सजाकर सिर पर रखकर गणगौर के गीत गाती हुई घर आती हैं । इसके बाद शुद्ध मिट्टी के शिव स्वरुप ईसर और पार्वती स्वरुप गौर की प्रतिमा बनाकर स्थापित करती हैं। शिव गौरी को सुंदर वस्त्र पहनाकर सम्पूर्ण सुहाग की वस्तुएं अर्पित की जातीं हैं। चन्दन, अक्षत, धूप , दीप , दूब व पुष्प से उनकी पूजा - अर्चना की जाती है। दीवार पर सोलह -सोलह बिंदियां रोली , मेहंदी व काजल की लगाई जाती हैं।  थाली में जल , दूध-दही , हल्दी , कुमकुम घोलकर सुहागजल तैयार किया जाता है। दोनों हाथों में दूब लेकर इस जल से पहले गणगौर को छींटे लगाकर फिर महिलाएं अपने ऊपर सुहाग के प्रतीक के तौर पर  इस जल को छिड़कती हैं। अंत में मीठे गुने या चूरमे का भोग लगाकर गणगौर माता की कहानी सुनी जाती है। पूजन करने वाली समस्त स्त्रियां बड़े चाव से  गणगौर के मंगल गीत गाती हैं  जो बेहद सुहावने लगते हैं। गणगौर के पूजन में प्रावधान है कि जो सिन्दूर माता पार्वती को चढ़ाया जाता है , महिलाएं उसे अपनी मांग में सजाती हैं । शाम को शुभ मुहूर्त में गणगौर को पानी पिलाकर किसी पवित्र सरोवर या कुंड आदि में इनका विसर्जन किया जाता है।

गणगौर पूजन के मंत्र
'ॐ उमामहेश्वराभ्यां नमः' मंत्र का जाप करते रहें।
या देवी सर्वभूतेषु माँ गौरी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥

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